महामारी के बाद सामान्य होता अमेरिका

बाइडेन ने राष्ट्रपति बनने के बाद महामारी को लेकर जैसी तत्परता दिखायी है और संयम के साथ काम लिया है, उसका असर अमेरिकी समाज पर दिख रहा है.

जे सुशील

अमेरिका में स्वतंत्र शोधार्थी

jey.sushil@gmail.com

ठीक एक साल पहले मार्च के महीने में ही अमेरिका ने कोरोना महामारी के बढ़ते खतरे को गंभीरता से लेना शुरू किया था और कई राज्यों ने एक साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को बंद करने का निर्णय किया था. तब से लेकर अब तक अमेरिका में संघीय सरकार भी बदल चुकी है. प्रतिनिधि संस्थाओं और राज्यों में भी राजनीतिक बदलाव हुए हैं. देश में अब तक पांच लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमण के कारण मारे गये हैं और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान हो चुका है.

पिछला एक साल अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए एक ऐसे अध्याय के रूप में गुजरा है, जिसके बारे में लंबे समय तक बात होती रहेगी. इस महामारी के कहर ने समूची मानवता को ऐसे अनुभवों से दो-चार किया है, जिनकी कल्पना भी सालभर पहले नहीं की जा सकती थी. इसके पूरे असर का ठीक-ठीक आकलन करने में भी बहुत समय लगेगा. प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक शक्ति होने के नाते अमेरिका इस संकट से कैसे जूझ रहा है और आगे वह क्या करेगा, इस पर दुनिया की नजर भी जमी रहेगी.

अमेरिका में सरकार बदलने के साथ ही स्थिति सामान्य होने की तरफ तेजी से बढ़ी है और अब राष्ट्रपति जो बाइडेन ने घोषणा की है कि एक मई तक हर वयस्क को वैक्सीन लगाने की कोशिश की जायेगी. अगर मई तक ऐसा नहीं भी होता है, तो समझिए कि जून या जुलाई के महीने तक अमेरिका में उन सभी लोगों को वैक्सीन मिल जायेगी, जो वैक्सीन लगाना चाहते हैं. हालांकि अमेरिका में वैक्सीन लगवाना अनिवार्य नहीं है, लेकिन संभवतः कई संस्थान बिना वैक्सीन के अपने कर्मचारियों को वापस दफ्तरों में न आने दें, तो एक तरह से इसकी अनिवार्यता हो ही जायेगी.

फिलहाल लगभग सभी राज्यों में मेडिकल सेवाओं से जुड़े लोगों और पैंसठ की उम्र से अधिक के लोगों को तेजी से वैक्सीन लग चुका है, लेकिन युवाओं में कहीं-कहीं पर अचानक से कोरोना फैलने की खबरें भी आ रही हैं. ऐसे में बार-बार सावधानी बरतने के निर्देशों में भी कोई कमी नहीं आयी है. हालांकि अमेरिका में ही एक तबका ऐसा भी है, जो वैक्सीन का विरोध कर रहा है और वैक्सीन लगवाने को तैयार नहीं है. इसका मुख्य कारण वैक्सीन के बारे में फैली गलत सूचनाओं को माना जा रहा है और सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि इन सूचनाओं का खंडन किया जाए.

वैक्सीन लगने के साथ ही धीरे-धीरे दुकानों, दफ्तरों और प्रतिष्ठानों को खोलने पर लगी रोक को भी हटाया जाने लगा है. यहां ये बताना जरूरी है कि पिछले एक साल में किसी भी समय इस देश में दवाई और दैनिक जरूरतों का सामान बेचनेवाली दुकानों को बंद नहीं किया गया था. भले ही उन दुकानों में कई बार सामान की आपूर्ति कम हो गयी थी, लेकिन दुकानों को बंद नहीं किया गया था. जो प्रतिष्ठान बंद हुए थे, उनमें प्रमुख थे- पब, रेस्तरां, सिनेमा हॉल, आर्ट गैलरियां, यूनिवर्सिटी, दफ्तर और ऐसी हर वह जगह, जहां लोगों की भीड़ होने की संभावना हो सकती थी.

पिछले एक साल में कोरोना महामारी के कारण कई छोटी दुकानें, रेस्तरां और कारोबार बंद हो चुके हैं और इससे लाखों डॉलर का नुकसान भी हो चुका है. अब धीरे-धीरे इन संस्थानों को भी खोला जा रहा है, लेकिन इन निर्देशों के साथ कि एक समय में कुछ ही लोग दफ्तर में रहें. मास्क पहने रहें और बार-बार हाथ धोते रहें. इन नियमों के साथ ही राष्ट्रपति बाइडेन ने उम्मीद जतायी है कि चार जुलाई को जब पूरा देश आजादी का पर्व मनायेगा, तो अमेरिका को कोरोना वायरस से भी आजादी मिल चुकी होगी.

चार जुलाई अमेरिकी समाज में वैसा ही महत्व रखता है, जैसा भारत में पंद्रह अगस्त. चार जुलाई की शाम को अमेरिका के लोग घर से बाहर निकलते हैं और जगह-जगह सरकार आतिशबाजी का इंतजाम करती है. यह एक कारण है कि बाइडेन चाहते हैं कि चार जुलाई से पहले ही हर वयस्क को टीका लगा दिया जाए क्योंकि भले ही लोग अभी घर से नहीं निकल रहे हैं, पर चार जुलाई को लोग बाहर निकलेंगे ही.

बाइडेन ने राष्ट्रपति बनने के बाद कोरोना महामारी को लेकर जिस तरह से तत्परता दिखायी है और बेकार की बयानबाजी न करते हुए संयम के साथ काम लिया है, उसका असर अमेरिकी समाज पर भी दिख रहा है. लोग संयमित हैं और मान रहे हैं कि अब वे इस महामारी को हरा देंगे. लोगों में अफरातफरी कम है. मास्क पहननेवाले लोगों की संख्या बढ़ी है और सड़क पर ऐसे नजारे कम हुए हैं, जहां लोग झुंड में घूम रहे हों.

बाइडेन की कार्यशैली भले ही कई लोगों को सुपरपावर देश के नेता के रूप में कमजोर लगती हो, लेकिन संभवतः कोरोना संक्रमण और नस्लभेद की घटनाओं से जूझ रहे देश को इस समय ऐसे ही नेता की जरूरत थी. बाइडेन ने अपने वादे के मुताबिक कोरोना महामारी के कारण परेशानी झेल रहे अमेरिकियों को नया राहत पैकेज भी दिया है और यह उम्मीद जतायी है कि स्थितियां जल्दी ही सामान्य हो जायेंगी. देश में मॉडेरना और फाइजर के बाद जॉनसन एंड जॉनसन ने भी नया टीका बनाया है, जिसे जल्दी ही इस्तेमाल में आने की आशा की जा रही है.

विशेषज्ञों का मानना है कि जॉनसन एंड जॉनसन का टीका मंजूर हो जाए, तो टीकाकरण अभियान में और तेजी आयेगी, क्योंकि कंपनी के पास एक बार में ही लाखों खुराक बनाने की क्षमता है. उल्लेखनीय है कि जॉनसन एंड जॉनसन का टीका एक ही खुराक का है और नब्बे प्रतिशत से अधिक प्रभावशाली बताया जा रहा है.

कोरोना महामारी से अमेरिका ने क्या सबक सीखा है और उन सबका आनेवाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा, यह तो बाद में ही पता चल सकेगा. फिलहाल यह कहना ठीक होगा कि बाइडेन प्रशासन के पास महामारी पर काबू पाने के बाद भी जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने, रूस और चीन के साथ अमेरिका के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने, अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने जैसी कई कठिन चुनौतियां हैं, जिनसे सफलतापूर्वक जूझने के लिए उन्हें नये तौर-तरीके अपनाने होंगे, पर ऐसा लगता है कि बाइडेन प्रशासन ने इस दिशा में ठोस प्रयास करना शुरू कर दिया है.

Posted By : Sameer Oraon

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Author: जे सुशील

Published by: Prabhat Khabar

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