इतिहास केवल वर्षों की गिनती से नहीं लिखा जाता. यह उन निर्णयों से बनता है, जो राष्ट्र की दिशा बदलते हैं और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करते हैं. वर्ष 2014 में भारत की जनता ने केवल एक सरकार नहीं बदली थी, उसने निराशा के स्थान पर विश्वास, नीतिगत जड़ता के स्थान पर निर्णायकता और परिवारवादी राजनीति के स्थान पर राष्ट्रहित को चुनने का संकल्प व्यक्त किया था.
इन बारह वर्षों में भारत ने अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन की लंबी यात्रा तय की. जनधन खातों से लेकर यूपीआइ तक, उज्ज्वला से लेकर आयुष्मान भारत तक, शौचालयों से लेकर नल के जल तक और मुफ्त राशन से लेकर प्रत्यक्ष लाभ अंतरण तक-सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का प्रयास हुआ. राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत का स्वर बदला है. सर्जिकल स्ट्राइक, आतंकवादी ढांचों के विरुद्ध कार्रवाई, सीमा पर मजबूत बुनियादी ढांचा और रक्षा उपकरणों के स्वदेशी निर्माण ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत अब केवल हमले सहने वाला राष्ट्र नहीं है. तेजस, ब्रह्मोस, आधुनिक ड्रोन, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और सेना के आधुनिकीकरण ने आत्मनिर्भर भारत की सामरिक शक्ति को मजबूत किया.
अनुच्छेद 370 को हटाने जैसा ऐतिहासिक निर्णय दशकों तक राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में अटका रहा. तीन तलाक के विरुद्ध कानून ने मुस्लिम महिलाओं को न्याय और सम्मान देने का प्रयास किया. नागरिकता संशोधन कानून ने पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे लोगों के लिए आशा का रास्ता खोला. देश में एक्सप्रेस-वे, सुरंगें, रेलवे लाइन, आधुनिक रेलवे स्टेशन, वंदे भारत ट्रेनें, हवाई अड्डे, पुल और नये औद्योगिक गलियारे बनाये गये. चिनाब रेल पुल, नया पंबन ब्रिज, चारधाम परियोजना और पूर्वोत्तर में विकसित होता आधारभूत ढांचा बदलते भारत के प्रतीक बने. काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और अयोध्या में श्रीराम मंदिर ने यह सिद्ध किया कि आधुनिकता और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं. चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत का गौरव चंद्रमा तक पहुंचाया. डिजिटल भुगतान, मोबाइल निर्माण, स्टार्टअप, सेमीकंडक्टर और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में बढ़ते कदमों ने विश्व को भारत की प्रतिभा और क्षमता से परिचित कराया. इन वर्षों में जब सरकार विकास, सुरक्षा और जनकल्याण की नीतियों को आगे बढ़ा रही थी, तब विपक्ष का बड़ा हिस्सा केवल विरोध की राजनीति में उलझा दिखाई दिया.
सरकार की प्रत्येक योजना का विरोध. प्रत्येक सुधार पर संदेह. प्रत्येक राष्ट्रीय उपलब्धि पर कटाक्ष. सेना की कार्रवाई पर प्रश्न. वैज्ञानिक सफलता पर किंतु-परंतु. संसद में चर्चा के स्थान पर नारेबाजी और व्यवधान. संसद लोकतांत्रिक विमर्श का सर्वोच्च मंच है. वहां कानूनों पर बहस होनी चाहिए. सरकार से कठिन प्रश्न पूछे जाने चाहिए. जनहित के विषय उठाये जाने चाहिए. परंतु अनेक अवसरों पर संसद को चलने ही नहीं दिया गया. कार्यवाही स्थगित करानी मानो राजनीतिक सफलता समझी गयी. विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, पर केवल विरोध के लिए विरोध लोकतंत्र की सेवा नहीं है. संसद का प्रत्येक बाधित घंटा देश की जनता के समय और संसाधनों का नुकसान है. यदि विपक्ष के पास बेहतर नीति है, तो उसे देश के सामने रखना चाहिए. केवल शोर, बहिर्गमन और गतिरोध किसी लोकतांत्रिक विकल्प का निर्माण नहीं करते.
सरकार के प्रत्येक कदम को लोकतंत्र के लिए खतरा बताने की इतनी जल्दबाजी रही कि विपक्ष वास्तविक जनसमस्याओं पर विश्वसनीयता खोता चला गया. राजनीतिक दलों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करने का पूरा अधिकार है. उनकी नीतियों की आलोचना भी होनी चाहिए. परंतु मोदी विरोध में देश की उपलब्धियों को छोटा करना, सेना के साहस पर संशय जताना, वैज्ञानिकों की सफलता को कमतर दिखाना और वैश्विक मंचों पर भारत की प्रतिष्ठा से असहज होना उचित नहीं कहा जा सकता. सरकारें आती-जाती हैं.
राजनीतिक दल चुनाव जीतते-हारते हैं, पर राष्ट्र सबसे ऊपर रहता है. जब भारत अंतरिक्ष में इतिहास रचता है, तो वह किसी एक पार्टी की सफलता नहीं होती. जब भारतीय सेना दुश्मन को जवाब देती है, तो वह पूरे राष्ट्र का पराक्रम होता है. जब कोई गरीब परिवार पक्के घर, शौचालय, गैस, राशन या इलाज की सुविधा प्राप्त करता है, तो उस परिवर्तन को राजनीतिक पूर्वाग्रह से नकारा नहीं जाना चाहिए. इन बारह वर्षों की कहानी केवल योजनाओं और परियोजनाओं की सूची नहीं है.
यह आत्मविश्वास लौटाते भारत की कहानी है. यह उस राष्ट्र की कहानी है, जो अब निर्णय लेने से डरता नहीं. जो अपनी सीमाओं की रक्षा करता है, संस्कृति का सम्मान करता है, तकनीक को अपनाता है और दुनिया के सामने अपनी बात दृढ़ता से रखता है. समस्याएं अभी भी हैं. चुनौतियां भी कम नहीं हैं. लोकतंत्र में सरकार से जवाब मांगना भी आवश्यक है. पर आलोचना तथ्यपूर्ण होनी चाहिए. विरोध रचनात्मक होना चाहिए.
विपक्ष को संसद रोकने के बजाय सरकार को तर्कों और बेहतर नीतियों से घेरना चाहिए. देश को बाधा डालने वाला विपक्ष नहीं, मजबूत और जिम्मेदार विपक्ष चाहिए. मतभेद हो सकते हैं. बहस हो सकती है. आलोचना भी हो सकती है. पर इस सत्य से इनकार कठिन है कि 2014 के बाद भारत की सोच, गति, आत्मविश्वास और वैश्विक उपस्थिति में बड़ा परिवर्तन आया है. अब देश को तय करना है कि उसे केवल विरोध की राजनीति चाहिए या विकास, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की निरंतर यात्रा? राष्ट्र प्रथम था. राष्ट्र प्रथम है. राष्ट्र प्रथम ही रहेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
