साइबर असुरक्षा सबसे बड़ा खतरा

Cyber Insecurity: विश्व आर्थिक मंच की रिपोर्ट में साइबर असुरक्षा को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है. इससे निपटने के लिए मजबूत डिजिटल और आर्थिक परिवर्तन विकसित करना, असमानता को व्यापक जोखिम के रूप में देखना, बहुआयामी खतरे तथा दुष्प्रचार का मुकाबला करना एवं जलवायु परिवर्तन को दीर्घकालिक विकास व सुरक्षा रणनीति में शामिल करना जरूरी है.

Cyber Insecurity: विश्व आर्थिक मंच ने दावोस वार्षिक सम्मेलन से पहले जारी सालाना ‘2026 ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट’ में साइबर असुरक्षा को भारत में सबसे बड़ा खतरा बताया है, जो चिंता की बात है. यह रिपोर्ट दुनियाभर के 1,300 से अधिक विशेषज्ञों के विचारों पर आधारित है, जिसमें वैश्विक स्तर पर मौजूदा अल्पकालिक और दीर्घकालिक जोखिमों का विश्लेषण किया गया है. रिपोर्ट कहती है कि नये प्रतिस्पर्धी युग में भू-राजनीतिक और आर्थिक जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं. इसमें भू-आर्थिक टकराव को 2026 का सबसे बड़ा जोखिम बताया गया है. यह टकराव, जिसमें देश व्यापार प्रतिबंध जैसे आर्थिक साधनों का लाभ उठाते हैं, आठ अंक ऊपर चढ़ गया है.

भू-आर्थिक टकराव के अलावा राष्ट्रों के बीच सशस्त्र टकराव, चरम मौसम, सामाजिक ध्रुवीकरण और गलत व भ्रामक सूचनाएं भी इस वर्ष के प्रमुख वैश्विक जोखिमों में शामिल हैं. रिपोर्ट में साइबर असुरक्षा को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है. यह खतरा आय असमानता, अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाओं, संभावित आर्थिक मंदी और राज्य आधारित सशस्त्र संघर्षों की चिंताओं से बढ़ जाता है.

इन जोखिमों से निपटने के लिए मजबूत डिजिटल और आर्थिक परिवर्तन विकसित करना, असमानता को एक व्यापक जोखिम के रूप में देखना, बहुआयामी खतरे (हाइब्रिड थ्रेट) तथा दुष्प्रचार का मुकाबला करना एवं जलवायु परिवर्तन को भारत की दीर्घकालिक विकास एवं सुरक्षा रणनीति में समाहित करना आवश्यक है. वैश्विक स्तर पर भी तकनीकी जोखिमों में वृद्धि देखी जा रही है, जिनमें भ्रामक सूचना और दुष्प्रचार दुनियाभर में पांचवें स्थान पर है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक विश्वास पर बढ़ते खतरे को दर्शाता है.

साथ ही, एआइ तकनीकों के नकारात्मक प्रभाव अब वैश्विक शीर्ष जोखिमों में शामिल हो गये हैं, जो रोजगार में कमी, नैतिक दुरुपयोग और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों की बढ़ती चिंताओं को दर्शाते हैं. वैश्विक सुरक्षा जोखिमों में साइबर सुरक्षा नौवें स्थान पर है, जो यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्थाएं और शासन प्रणाली जैसे-जैसे डिजिटल होती जा रही हैं, वैसे-वैसे उनकी डिजिटल संवेदनशीलता भी बढ़ रही है.

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Author: संपादकीय

Published by: Pritish Sahay

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