ऊर्जा संकट में विकल्प है कोयले से गैस

Energy Crisis : कोयला गैसीकरण से उत्पन्न सिनगैस मेथनॉल और अन्य रसायनों के उत्पादन में सहायक हो सकती है. मेथनॉल अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन है, जो परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन का विकल्प बन सकता है.

-डॉ देबजित पालित और शगुन ममगैन-

Energy Crisis : पश्चिम एशिया का संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति को बाधित कर रहा है, जिससे आयातित जीवाश्म ईंधनों पर भारत की निर्भरता उजागर हो रही है. इसका असर बड़ा है, क्योंकि भारत अपनी कुल तेल और गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में जलवायु प्रतिबद्धताओं के अगले चरण को मंजूरी देकर विकास जरूरतों और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की परंपरा कायम रखी है.

जीवाश्म ईंधनों से दूर जाने की बात की जा रही है, पर अल्प और मध्यम अवधि में कोयले पर देश की निर्भरता बनी रहने की संभावना है. कोयला आधारित बिजली उत्पादन के अलावा ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला की मजबूती बढ़ाने के लिए कोयला गैसीकरण जैसे नये क्षेत्र-जैसे कोयले से गैस, रसायन और तरल ईंधन उत्पादन-की खोज की जा रही है. ये परियोजनाएं कोलफील्ड्स के आर्थिक विकास को भी बढ़ावा दे सकती हैं.


कोयला गैसीकरण के तहत कोयले को संश्लेषित गैस (सिनगैस) में बदला जाता है. यह गैस कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन व जलवाष्प जैसे घटकों का मिश्रण होती है. इसका उपयोग विभिन्न रसायनों तथा हाइड्रोजन व बिजली उत्पादन के लिए किया जा सकता है. नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के बावजूद अस्थिरता और भंडारण की सीमाओं के कारण कोयले का प्रत्यक्ष उपयोग भारत की बेसलोड बिजली आपूर्ति में केंद्रीय बना हुआ है. नीति आयोग, चिंतन रिसर्च फाउंडेशन और अन्य संस्थाओं के अध्ययन बताते हैं कि 2050 के दशक तक कोयला बेसलोड बिजली प्रदान करता रहेगा. देश की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोयले के वैकल्पिक उपयोग जरूरी हैं.

कोयला गैसीकरण से उत्पन्न सिनगैस मेथनॉल और अन्य रसायनों के उत्पादन में सहायक हो सकती है. मेथनॉल अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन है, जो परिवहन क्षेत्र में जीवाश्म ईंधन का विकल्प बन सकता है. खासकर शिपिंग में बढ़ती वैश्विक मांग इसकी प्रासंगिकता को मजबूत करती है. मेथनॉल उत्पादन फार्मास्युटिकल क्षेत्र को भी सहारा देगा, क्योंकि यह सक्रिय औषधीय अवयवों (एपीआइ) के लिए जरूरी इनपुट प्रदान करेगा, जिससे आयात पर निर्भरता कम होगी. सिनगैस का उपयोग डाइमिथाइल ईथर उत्पादन में भी किया जा सकता है, जिसे एलपीजी के साथ मिलाया जा सकता है. इससे आयात में कमी आयेगी और घरेलू ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी.


कोयला गैसीकरण से हाइड्रोजन भी उत्पन्न होती है, जिसे आमतौर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण ‘ग्रे हाइड्रोजन’ कहा जाता है. कार्बन कैप्चर तकनीक के साथ जोड़े जाने पर इसे ‘ब्लू हाइड्रोजन’ कहा जाता है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन, औद्योगिक ताप और परिवहन प्रणालियों में उत्सर्जन कम करने के लिए किया जा सकता है. कार्बन कैप्चर मिशन के लिए बजटीय आवंटन ने सिनगैस उत्पादन को कार्बन प्रबंधन से जोड़ने के लिए एक सक्षम ढांचा प्रदान किया है. स्टील, उर्वरक और एल्यूमिनियम के डीकार्बोनाइजेशन में भी हाइड्रोजन उपयोगी हो सकती है, जिससे पर्यावरणीय लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी. कोयला गैसीकरण से प्राप्त हाइड्रोजन को नाइट्रोजन के साथ मिलाकर अमोनिया बनाया जा सकता है.

घरेलू अमोनिया और यूरिया उत्पादन के विस्तार से भारत की आयात निर्भरता कम होगी. रणनीतिक रूप से विकसित कोयला गैसीकरण क्षमता बुनियादी ढांचे और प्रसंस्करण सुविधाओं में बड़े निजी निवेश को आकर्षित कर सकती है. एकीकृत कोयला गैसीकरण परिसर श्रम प्रधान होता है, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होते हैं. संचालन शुरू होने के बाद ये परियोजनाएं संचालन और रख-रखाव में प्रत्यक्ष रोजगार के साथ लॉजिस्टिक्स, सेवाओं और सहायक उद्योगों में बड़े पैमाने पर अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न करती हैं. कोयला खदानों की भूमि का पुन: उपयोग कर गैसीकरण अवसंरचना विकसित की जा सकती है. यह आगे चलकर पेट्रोकेमिकल्स, उर्वरक और विशेष रसायनों जैसे उद्योगों के विकास को भी बढ़ावा दे सकती है, जिससे एकीकृत औद्योगिक क्लस्टर और क्षेत्रीय आर्थिक केंद्र बन सकते हैं.

इन संभावनाओं को देखते हुए ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे कोयला समृद्ध राज्यों में कोल इंडिया की सहायक कंपनियों और प्रमुख निजी कंपनियों द्वारा दो लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की प्रतिबद्धता जतायी गयी है, जो क्षेत्रीय आर्थिक विकास और स्थानीय रोजगार सृजन को बढ़ावा देगी. केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2020-21 में राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन शुरू किया, जिसका लक्ष्य 2030 तक 10 करोड़ टन कोयले का गैसीकरण करना है, ताकि कोयले के दाम और इसकी उपयोगिता को अधिकतम किया जा सके. हालांकि इस क्षेत्र में प्रगति सीमित रही है. भारतीय कोयले चूंकि उच्च राख वाले हैं, इसलिए विशेष गैसीकरण तकनीकों की जरूरत होती है, साथ ही, उत्सर्जन कम करने के लिए कार्बन कैप्चर के साथ एकीकरण जरूरी है. ये परियोजनाएं पूंजी-गहन होती हैं, जिनमें उच्च प्रारंभिक निवेश, जटिल राख प्रबंधन और पर्यावरणीय अनुपालन शामिल हैं.


कोयला गैसीकरण के लिए व्यवसाय मॉडल विकसित हो रहा है. केंद्र स्तर पर इन परियोजनाओं को कोर इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में मान्यता देने पर पारदर्शी नीलामी से दीर्घकालिक कोयला उपलब्धता सुनिश्चित हो सकती है, अनुमोदन प्रक्रिया सरल हो सकती है और सस्ती पूंजी आकर्षित की जा सकती है. राज्य सरकारों की भूमिका क्लस्टर आधारित विकास को बढ़ावा देने और भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृति व अनुपालन प्रक्रियाओं को तेज करने में महत्वपूर्ण है. कम बिजली दर, बिजली शुल्क में छूट और विश्वसनीय ग्रिड कनेक्टिविटी जैसे प्रोत्साहन परियोजनाओं की व्यवहार्यता बढ़ा सकते हैं.

जल की उपलब्धता, पाइपलाइन, कन्वेयर और ट्रांसमिशन लाइनों के लिए मार्ग अधिकार, तथा सिंगल-विंडो क्लीयरेंस प्रणाली भी कोयला गैसीकरण के विस्तार के लिए जरूरी होंगे. हालांकि कोयला जलाना प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन का कारण बनता है, पर देश का जन-केंद्रित ऊर्जा रूपांतरण एक संतुलित सह-अस्तित्व की मांग करता है, जहां कोयला गैसीकरण जैसे स्वच्छ विकल्पों के साथ नवीकरणीय ऊर्जा का तेज विस्तार हो, साथ ही, औद्योगिक विकास, आर्थिक प्रगति, आपूर्ति शृंखला की मजबूती और ऊर्जा सुरक्षा को बनाये रखा जा सके.
(ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)

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