चीनी निवेश के विकल्प

चीन एक शत्रु देश होने के कारण उसकी पूंजी को अवसर नहीं मिलने से उसकी आर्थिक शक्ति भी क्षीण होगी. आज भारत ही नहीं, समूचा विश्व चीन को सबक सिखाने के लिए तैयार है. भारत को भी अपने दायित्व से पीछे नहीं हटना चाहिए

डॉ. अश्विनी महाजन, एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

ashwanimahajan@rediffmail.com

पिछले 20 वर्षों में चीन ने भारत समेत दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर अपना शिकंजा कसने का प्रयास किया है. सर्वविदित है कि उसने आक्रामक विदेश व्यापार नीति के माध्यम से बाजारों पर वर्चस्व जमाया है. निर्यात सहायताओं द्वारा माल को सस्ता कर बेचना (जिसे डंपिंग भी कहा जाता है) या अंडर इनवाइसिंग यानी माल का बिल कम दिखाते हुए दूसरे देशों में भेजना, घटिया माल बेचना और कई बार तो तस्करी द्वारा भी माल बेचना जैसे कई अनैतिक और गैरकानूनी हथकंडे चीन अपनाता रहा है. कुछ देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते हैं, जिनके तहत उनसे शून्य आयात शुल्क पर आयात किया जाता है. चीन इन रास्तों से भी माल भेजने का गलत काम करता रहा है.

दूसरी तरफ चीन अपनी कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर टेंडर दिलाने के लिए कम राशि अंकित करवाता है, जिसके कारण वह कई सामरिक महत्व के ठिकानों पर टेंडर हासिल कर लेता है. सोशल मीडिया, ई-कॉमर्स और अन्य प्रकार के एप के माध्यम से भी वह लाभ तो कमा ही रहा है, साथ ही हमारी जनता की बहुमूल्य जानकारियों को भी इकट्ठा कर चीन में भेजकर हमारे लिए सुरक्षा संकट उपस्थित करता है. इन करतूतों के विरोध में भारत सरकार ने भी अपना रुख सख्त कर दिया है. चीनी एप पर प्रतिबंध और कंपनियों के ठेके रद्द करने जैसे फैसले हुए हैं. आयात को रोकने के लिए शुल्क बढ़ाने और गैर-टैरिफ उपायों की तैयारी हो रही है.

कुछ समय से चीनी कंपनियां और निवेशक (जिन्हें चीनी सरकार से अलग कर नहीं देखा जा सकता) भारी मात्रा में भारतीय स्टार्टअप और अन्य व्यवसायों में निवेश कर रहे हैं. यूं तो सीधे तौर पर भारत में चीन का निवेश मात्र आठ अरब डालर ही है, लेकिन जानकार मानते हैं कि वास्तविक निवेश इससे कहीं ज्यादा है क्योंकि चीनियों ने छद्म रूप से अन्य देशों के माध्यम से भी भारत में निवेश किया है. कुछ लोगों का यह कहना है कि चीन से निवेश को रोकना नहीं चाहिए क्योंकि इससे हमारे स्टार्टअप का वित्तीय पोषण बंद हो सकता है और व्यवसायों व रोजगार पर असर पड़ सकता है. सस्ते आयात के पक्ष में भी तर्क दिया जाता है कि इससे उत्पादकों की लागत कम होती है और वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं.

लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे स्टार्टअप ही हमारे भविष्य के उद्योग और व्यवसाय हैं. यदि निवेश के कारण उनका स्वामित्व और प्रबंधन चीनी हाथों में चला जाता है, तो उनमें कुछ भी भारतीय नहीं रहेगा. उनके व्यवसायिक निर्णय ही नहीं, बहुमूल्य बाजार और डाटा भी चीनी हाथों में चला जायेगा. पेटीएम का उदाहरण हमारे सामने है. डिजिटल भुगतान में सबसे अधिक बाजार की हिस्सेदारी के साथ पेटीएम चीन के अलीबाबा के हाथों में है. वह अब बैंकिंग में भी पैर पसार रहा है.

हाल ही में अलीबाबा ने पेटीएम के माध्यम से मृतप्राय बीमा कंपनी रहेजा क्यूबीई जनरल इंश्योरेंस कंपनी को खरीद कर बीमा व्यवसाय में प्रवेश का प्रयास किया है. निष्कर्ष यह है कि चीनी निवेश को केवल निवेश के रूप में नहीं, बल्कि अपने व्यवसायों को चीनी हाथों में सौंपने के रूप में देखा जाना चाहिए. आज चीन के बहिष्कार के चलते भारतीय उद्यमों, एप, भुगतान कंपनियों, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों का व्यवसाय आगे बढ़ रहा है. ऐसे में यदि चीनी निवेश रोका नहीं गया, तो ये कंपनियां भी देर-सबेर चीनी हाथों में चली जायेंगी.

यह जरूरी है कि हमारे भारतीय निवेशक स्टार्टअप में निवेश करें. काफी समय से भारतीय निवेशक उद्यम पूंजी (वेंचर कैपिटल) के माध्यम से निवेश कर भी रहे हैं. इस पूंजी में भारत के बड़े औद्योगिक घरानों और धनवान व्यक्तियों का पैसा लगा है. स्टार्टअप के उद्यम अधिकांशत: ई-कॉमर्स, सोशल मीडिया एप, उपभोक्ता सेवाओं, उत्पादन सेवाओं, कृषि से संबंधित व्यवसाय आदि में कार्यरत हैं. चूंकि इनमें अत्यधिक जोखिम होता है, इसलिए बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान उन्हें ऋण देने में कतराते हैं. लेकिन वेंचर कैपिटलिस्ट इन्हें आसानी से पूंजी देने के लिए तैयार हो जाते हैं क्योंकि कुछ के असफल होने पर भी सफल उद्यमियों से होनेवाले लाभ उनकी हानि की पूर्ति कर देते हैं. वेंचर कैपिटलिस्ट भारतीय भी हैं और विदेशी भी.

विदेशियों में चीनी, अमेरिकी यूरोपीय और अन्य देशों के फंड शामिल हैं. भारत के ई-कॉमर्स और डिजिटल भुगतान से संबंधित स्टार्टअप कंपनियों में फंडों का निवेश बहुत अधिक बढ़ चुका है. चिंता की बात यह है कि इन कंपनियों के स्वामित्व के माध्यम से चीन हमारे यहां से बहुत डाटा ले जा रहा है, जो हमारे व्यवसाय, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा, सामाजिक ताने-बाने तथा धार्मिक सद्भाव के लिए भारी खतरा है. यह जरूरी है कि न केवल संभावित चीनी निवेश को रोका जाये, बल्कि वर्तमान चीनी निवेश को वापस करने के उपाय खोजे जायें.

भारत में पूंजी की लागत अधिक है, इसलिए कंपनियां चीन व अन्य देशों से कम ब्याज पर ऋण लेती रही हैं. कई बार चीन अपने उपकरणों और मशीनों को बेचने के उद्देश्य से भी कम ब्याज पर ऋण देता रहा है. इससे देश पर चीन का ऋण बढ़ता रहा है. अधिकतर वेंचर कैपिटलिस्ट फंडों में निवेश करनेवाले लोग आमदनी पर टैक्स देने के बाद स्टार्टअप के लिए धन उपलब्ध कराते हैं. विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की दृष्टि से विदेशी निवेशकों को कर से छूट दी गयी थी, लेकिन आज बदली हुई परिस्थितियों में जहां चीन से निवेश आना अनपेक्षित है, कम से कम कर देयता में समता का सिद्धांत लागू कर हम भारतीय निवेश को प्रोत्साहित कर सकते हैं. चीनी निवेश को रोकने से देश को कई लाभ होंगे.

एक, स्टार्टअप देश के स्वामित्व में रहेंगे और उनके लाभ चीन नहीं जायेंगे. दूसरे, आइडिया और बौद्धिक संपदा का पलायन नहीं होगा. चीन बौद्धिक संपदा की चोरी करता रहा है. तीसरे, हमारे देश का बहुमूल्य डाटा भी चीन नहीं जा पायेगा, जिससे हम अपनी सामरिक सुरक्षा को सुनिश्चित कर ही पायेंगे, साथ ही हमारे ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया पर हमारा अधिकार सुनिश्चित होगा. चौथा, चीन एक शत्रु देश होने के कारण उसकी पूंजी को अवसर नहीं मिलने से उसकी आर्थिक शक्ति भी क्षीण होगी. आज भारत ही नहीं, समूचा विश्व चीन को सबक सिखाने के लिए तैयार है. भारत को भी अपने दायित्व से पीछे नहीं हटना चाहिए.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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