प्रधानमंत्री मोदी ने डिजिटल जगत में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ऑस्ट्रेलिया सरकार के प्रयासों की सराहना की है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस घेब्रेयेसस और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी इस बारे में चिंता जाहिर कर चुके हैं. डिजिटल की आभासी दुनिया में बच्चों को परिभाषित करना बड़ी चुनौती है. आपराधिक जवाबदेही, यौन संबंध, विवाह, कांट्रैक्ट, गुटखा और शराब के सेवन, नौकरी और मतदान के बारे में न्यूनतम उम्र के अलग कानूनों से विसंगतियां बढ़ रही हैं.
इस बारे में भारत में बच्चों से जुड़े छह मुद्दों पर चल रही कानूनी बहस को समझना आवश्यक है- पहला- संविधान के अनुसार 18 साल के बच्चों को भारत में बालिग मानते हुए उन्हें मतदान का अधिकार मिलता है. लेकिन डिजिटल दुनिया में बालिग होने की उम्र के लिए स्पष्ट कानून नहीं हैं. अमेरिका में चिल्ड्रन ऑनलाइन प्राइवेसी प्रोटेक्शन एक्ट के अनुसार, 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया जॉइन नहीं कर सकते. उसके अनुसार, केएन गोविंदाचार्य मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 अगस्त, 2013 के फैसले से भारत में भी 13 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया खातों के खोलने पर प्रतिबंध को सही ठहराया था. लेकिन कांट्रेक्ट एक्ट के अनुसार, भारत में नाबालिग बच्चे ऑनलाइन गेम नहीं खेल सकते.
सोशल मीडिया कंपनियां डिजिटल अनुबंध के माध्यम से नाबालिग बच्चों के संवेदनशील डाटा का व्यावसायिक इस्तेमाल भी नहीं कर सकतीं. इसलिए ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए भारत में नये कानून की बजाय मजबूत नियामक और वर्तमान कानूनों पर सख्त अमल की जरूरत है. दूसरा- डिजिटल दुनिया में बच्चों को 13 साल में ही युवा बनाया जा रहा है. लेकिन भारत में परंपरागत कानूनों के अनुसार, शादी के लिए लड़कों के लिए 21 वर्ष और लड़कियों के लिए 18 वर्ष न्यूनतम उम्र है.
लड़के और लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र एक बराबर करने के टेढ़े सवाल पर कई दशकों से मंथन चल रहा है. लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 साल से बढ़ाकर 21 साल करने के लिए 2021 में केंद्र सरकार ने संसद में विधेयक पेश किया था, जो लोकसभा भंग होने के बाद रद्द हो गया था. मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, रजस्वला लड़कियों का 15 साल की उम्र में भी निकाह हो सकता है. लेकिन उत्तराखंड, असम और अब मध्य प्रदेश में यूसीसी के अनुसार, मुस्लिम लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष के प्रस्तावित कानून पर नये सिरे से मुकदमेबाजी बढ़ सकती है.
तीसरा- संविधान के अनुच्छेद-15 और 39 में बच्चों की सुरक्षा और कल्याण के लिए अनेक प्रावधान हैं. बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़े अपराधों पर सख्त दंड के लिए 2012 में पॉक्सो कानून बनाया गया. सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ के अनुसार 16 साल से 18 साल की उम्र के किशोर बच्चों के बीच सहमति से स्थापित यौन संबंधों को पॉक्सो के तहत अपराध नहीं मानना चाहिए. इससे पहले भी जस्टिस संजय करौल और एन कोटिश्वेर सिंह की पीठ ने पॉक्सो कानून में रोमियो-जूलियट जैसे प्रावधान के अपवाद से किशोर बच्चों के बीच सहमति से हुए यौन संबंधों को आपराधिकता के दायरे से दूर रखने की बात कही थी. दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड ने प्राइमरी टीचर के लिए न्यूनतम उम्र 21 से घटाकर 18 साल कर दिया है.
अठारह साल के लड़के वोट डाल सकते हैं, नौकरी कर सकते हैं, लेकिन शादी नहीं कर सकते. शादी की उम्र 21 वर्ष और यौन संबंधों की उम्र 16 वर्ष होने पर लिव-इन संबंधों को बढ़ावा मिलने के साथ पॉक्सो कानून अप्रासंगिक हो जायेगा. चौथा- अनेक देशों में नाबालिगों के माध्यम से आपराधिक गैंग, हत्या, ड्रग तस्करी और हिंसक अपराध करा रहे हैं. इसकी वजह से स्वीडन, डेनमार्क ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना में बच्चों की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए न्यूनतम उम्र के कानून में बदलाव हो रहे हैं. अपने देश में 18 साल से छोटे बच्चों पर किशोर न्याय कानून लागू होता है. निर्भया कांड के बाद कानून में बदलाव के अनुसार, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग यदि जघन्य अपराध के आरोपी हों, तो उनके खिलाफ वयस्कों की तरह मुकदमा चल सकता है.
पांचवां- बच्चों की सुरक्षा और पॉक्सो कानून के प्रभावी पालन के बारे में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने नया फैसला दिया है. अरुणाचल प्रदेश में बच्ची के यौन उत्पीड़न मामले में स्कूल प्रशासन ने पुलिस और अधिकारियों को जानकारी नहीं दी थी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, अब शिक्षिका के खिलाफ पॉक्सो और आइपीसी कानून के तहत मुकदमा चलेगा. कुछ साल पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बाल यौन शोषण और पोर्नोग्राफी के संगठित आपराधिक गिरोह के खिलाफ कार्रवाई हुई थी. उस मामले में सीबीआइ के आरोप पत्र के अनुसार, उत्तर प्रदेश के इंजीनियर दंपति को फरवरी, 2026 में विशेष अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी.
छठा- नीट मामले पर टेलीग्राम पर प्रतिबंध के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के जवाब के अनुसार, सोशल मीडिया से बच्चों के यौन शोषण और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के कंटेंट का संगठित तौर पर प्रसार हो रहा है. उसके बाद 'बीबीसी' की रिपोर्ट आयी, जिसके अनुसार, इंस्टाग्राम ने व्यावसायिक मुनाफे के लिए रिकमेंडेशन एल्गोरिदम के माध्यम से बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को भारत में बढ़ावा दिया है. मेटा के स्पष्टीकरण के अनुसार, पिछले साल फेसबुक और इंस्टाग्राम में 40 लाख से ज्यादा संदिग्ध खातों के साथ बच्चों से जुड़े 3.6 करोड़ आपत्तिजनक कंटेंट हटाये गये हैं.
आइटी सचिव एस कृष्णन के अनुसार, इंटरनेट मीडिया पर 16 साल से कम उम्र के बच्चों की सुरक्षा के बारे में हितधारकों के साथ विमर्श हो रहा है. इंजीनियर दंपति को फांसी की सजा देते हुए बाल यौन शोषण अपराध को जज ने 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' कहा था. डिजिटल जगत में बढ़ रहे जघन्य अपराधियों के खिलाफ सख्त कारवाई होनी चाहिए. इंस्टाग्राम के विज्ञापनदाताओं और चाइल्ड पोर्नोग्राफी संबंधी वीडियो का प्रसार करने वालों के खिलाफ पॉक्सो, बीएनएस कानून और सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले के अनुसार आपराधिक मामला दर्ज होने से संगठित अपराधों पर रोक लगेगी. देश के सभी राज्यों और डिजिटल इंडिया में बच्चों से जुड़े सभी मामलों में एक देश एक कानून के बारे में संसद में भी बहस होनी चाहिए. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
