Budget 2026 : अगले कुछ महीने में चार राज्यों और पुदुचेरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें से असम को छोड़कर अन्य तीनों राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में गैर भाजपा-गैर एनडीए की सरकारें हैं. ऐसे में हर कोई यही मानकर चल रहा था कि वित्त मंत्री सीतारमण का बजट भाषण चुनावी भाषण बन जायेगा. लेकिन बजट की बड़ी तस्वीर कुछ और बयान करती है.
यह एक संयोग है कि सी-वोटर का एक सर्वे बजट से ठीक पहले आया है और इसमें बताया गया है कि असम को छोड़ कर अन्य तीन राज्यों में भाजपा के लिए पाने को कुछ भी खास नहीं है. भाजपा हालांकि पश्चिम बंगाल में बहुत ज्यादा मेहनत कर रही है. लेकिन तमिलनाडु और केरल में तो वैसे भी उसके सत्ता में आने की संभावना नहीं है. इसको लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी कोई गलतफहमी नहीं है.
ऐसे में, सरकार ने इस बजट के साथ बेमतलब की राजनीति करने के बजाय इसे विशुद्ध अर्थनीति पर ही केंद्रित रखने का निर्णय लिया. इससे वह न केवल बजट का राजनीतिकरण करने के आरोपों से बच गयी, बल्कि इससे उसे विकास के साथ कोई समझौता न करने वाली सरकार की छवि गढ़ने का भी मौका मिल गया. बजट में बेशक चुनावी राज्यों पर केंद्रित कुछ छुटपुट घोषणाएं की गयी हैं. जैसे जो सात हाई प्रोफाइल रेल कॉरिडोर स्थापित करने की घोषणा की गयी है, उनमें से तीन-हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरू और वाराणसी-सिलीगुड़ी चुनावी राज्यों में होंगे.
ऐसे ही, बजट में नारियल और काजू संवर्धन योजना का लाभ केरल को, मत्स्यपालन योजना का लाभ पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु तथा केरल को तथा तटवर्ती इलाकों में नारियल, चंदन, कोको, काजू जैसी ऊंची कीमतों वाली फसल को प्रोत्साहित करने की योजना का लाभ दक्षिण के दो चुनावी राज्यों को मिलेगा. ऐसे ही, नये बौद्ध सर्किट के एलान से असम को फायदा होगा. पर्यटन पर जो जोर बजट में दिया गया है, उसका भी कुछ लाभ चुनावी राज्यों को मिलेगा.
लेकिन इन घोषणाओं को चुनाव प्रेरित नहीं माना जा सकता. हर बजट में कुछ न कुछ ऐसी घोषणाएं होती ही हैं, जो किसी न किसी न राज्य से जुड़ी होती हैं. अगर इन राज्यों में चुनाव न होते, तब भी इनमें से अधिकांश घोषणाएं की जातीं. तब शायद इनकी चर्चा नहीं होती. वित्त मंत्री ने बजट भाषण देते समय तमिलनाडु की खास पहचान मानी जाने वाली कांजीवरम की साड़ी पहन रखी थी.
इसे भी कुछ लोगों ने राजनीति से जोड़कर देखा. लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि निर्मला सीतारमण तमिलनाडु से ही ताल्लुक रखती हैं. इसलिए वहां की साड़ी पहनने का मतलब केवल चुनावी नहीं हो सकता. इसके अलावा मतदाता भी अब समझदार हो गये हैं. वे ऐसी बातों से इतना प्रभावित नहीं होते कि उनकी भावनाएं वोट में तब्दील हो सकें.
इसलिए यह कहने में गुरेज नहीं है कि भाजपानीत केंद्र सरकार ने बजट पेश करते हुए चुनावी राज्यों पर बहुत ज्यादा जोर नहीं दिया है. इसी कारण उसके कर्ताधर्ता भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे होंगे कि बजट को अनावश्यक पॉलिटिकल टच देने का कोई औचित्य नहीं है. वैसे भी, आर्थिक सर्वेक्षण ने लोकप्रियतावादी कदम न उठाने के संकेत दे दिये थे. आर्थिक सर्वेक्षण में लोकलुभावन घोषणाओं और नकद हस्तांतरण योजनाओं को लेकर गहरी चिंता जतायी गयी थी.
इसमें कहा गया था कि पिछले तीन वर्षों में ऐसी योजनाएं राज्यों के कुल बजट खर्च का 8.26 फीसदी तक हिस्सा खा रही हैं. आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया कि यदि राज्यों ने अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर और कौशल विकास जैसे उत्पादक कार्यों के बजाय केवल नकद बांटने में लगाया, तो यह भविष्य की आर्थिक वृद्धि को बाधित कर देगा. इस आर्थिक सर्वे के बाद भी अगर केंद्र सरकार खुद अपने बजट में चुनाव केंद्रित लोकलुभावन घोषणाएं करती, तो उस पर कथनी व करनी में अंतर के आरोप लगते.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
