जन्मशती पर विशेष : स्त्रियों के आत्मनिर्भर होने की पैरोकार थीं कृष्णा सोबती

Krishna Sobti : 'मित्रो मरजानी' या 'ऐ लड़की' में उन्होंने जैसा नारीवादी लेखन किया है, वह समाज की परंपरागत जकड़बंदियों को तोड़ता है, उसे पढ़ते हुए लोगों को लगता है कि कृष्णा जी चूंकि महिला हैं, इसलिए नारीवादी भी हैं.

Krishna Sobti : यह संयोग ही है कि अब जब हम कृष्णा सोबती का जन्म शताब्दी वर्ष (18 फरवरी, 1925-25 जनवरी, 2019) मना रहे हैं, उसी दौर में हम स्वतंत्र भारत के संविधान की 75वीं वर्षगांठ भी मना रहे हैं. अभी कुछ वर्ष पूर्व ही हम देश की आजादी के 75 वर्ष का उत्सव भी देख चुके हैं. यह संयोग इसलिए याद आ रहा है कि कृष्णा जी शायद उन दुर्लभ साहित्यकारों में से थीं, जिनके साथ बातचीत शुरू करने के थोड़ी ही देर बाद किसी न किसी प्रसंग में राष्ट्रीय समस्याओं का जिक्र आ जाता था. संविधान के अनुसार चल रहे हमारे देश में कहीं अवरोध या विकृति या विचलन नजर आता था, तो वे तुरंत उस पर टिप्पणी करती थीं और उस पर विस्तार से बातें करती थीं. यह एक ऐसा अनुभव है जो मुझे कृष्णा जी के साथ ही अधिक महसूस हुआ.


उनकी दूसरी खूबी यह थी कि वे जहां कहीं भी अन्याय होता देखती थीं, उनके मन में रोष जागता था. वे उसे ठीक नहीं मानती थीं और चाहती थीं कि उसका विरोध हो. मृत्यु शैय्या पर थी इसे लेकर सजग थीं. यह मृत्यु से तीन-चार दिन पहले की बात होगी, अस्पताल में उनसे बातें हो रही थीं, तो उन्होंने कहा कि गिरधर कुछ होना चाहिए, कुछ करना चाहिए, यह सब क्या हो रहा है? मैंने कहा कि कृष्णा जी इस समय सारी दुनिया में ही कुछ न कुछ हो रहा है, हम कैसे, क्या करें? एक पल चुप रहने के बाद उन्होंने कहा कि ठीक है, सारी दुनिया वाले नहीं कर रहे हैं, न सही, पर हमें तो करना चाहिए. तो कृष्णा जी उन साहित्यकारों में थीं, जिनकी नजर समग्रता और संपूर्णता पर रहती थी. वे नहीं चाहती थीं कि जो समग्रता वाला भारत हमें मिला है, उसके ताने-बाने में किसी तरह का कोई बदलाव हो. यह बात उनकी रचनाओं के पात्रों में भी दिखाई देती है. आप विषयवस्तु देखिए उनकी कहानियों के, उपन्यासों के, तो उसमें भी आपको एक बहुत बड़ा वृत्त मिलेगा. एक बहुत बड़ी रेंज मिलेगी. एक बात और, जिस तरह रेणु ने भाषा का जो संस्कार दिया है, उसी तरह कृष्णा जी ने भी हिंदी की कितनी सारी रंगते हमारे सामने उभार कर रखी हैं, जो दूसरे साहित्यकार बहुत कम कर पाये. बोलियों के माध्यम से भी चरित्रों को उभारने की एक अनूठी कोशिश कृष्णा जी ने की है, जो बड़ी कठोर साधना है.


‘मित्रो मरजानी’ या ‘ऐ लड़की’ में उन्होंने जैसा नारीवादी लेखन किया है, वह समाज की परंपरागत जकड़बंदियों को तोड़ता है, उसे पढ़ते हुए लोगों को लगता है कि कृष्णा जी चूंकि महिला हैं, इसलिए नारीवादी भी हैं. पर कृष्णा जी का खुद का कहना है कि वे उस तरह से स्त्रीवादी नहीं हैं और वे लेखिका भी कहलाना नहीं चाहती. वे खुद को लेखक बोलती हैं. देखिए, यह उसी समग्रता की बात है जहां स्त्री-पुरुष दोनों को एक नजरिये से देखा जाना चाहिए. स्त्रियों के बारे में उनका निश्चित मत था कि जब तक स्त्री आत्मनिर्भर नहीं होगी, आर्थिक रूप से अपने पैरों पर नहीं खड़ी होगी, सुशिक्षित नहीं होगी, तब तक उसकी मुश्किलें दूर नहीं होंगी, उस पर अत्याचार होते ही रहेंगे. और इस ख्याल से उन्होंने बहुत से प्रश्न उठाये हैं.

‘ऐ लड़की’ तो बहुत ही जबरदस्त कहानी है. यह कहानी आपको कहीं से छुटकारा नहीं देती. इस कहानी में कई परिस्थितियों के बीच की जबरदस्त बहस है. इसी तरह ‘मित्रो मरजानी’ की कहानी है कि तमाम विद्रोह के बावजूद वह स्त्री एक पारिवारिक जीवन जीना ही बेहतर मानती हैं. तो जीवन की जो जटिल गुत्थियां हैं, उनकी तरफ इशारा करके वे बताती हैं कि समाधान आसान नहीं है, पर संघर्ष जरूरी है. वास्तव में वे अपनी रचनाओं के पात्रों के माध्यम से समाज में मौजूद तमाम समस्याओं का मंथन करती हैं. इस मामले में उनका लेखन दूसरों से एकदम अलग है.


कृष्णा जी बहुत साहसी थीं. जिस तरह का संकीर्ण समाज हमारा है, उसमें अपनी शर्तों पर जीवन जीना बहुत कठिन है. पर कृष्णा जी ने ऐसा किया. पिता और मां का अपार प्रेम पाने के बाद भी लिखने-पढ़ने के लिए उन्होंने उनसे अलग रहना तय किया. लेखन में उनका साहस देखिए कि उन्होंने ‘यारों के यार’ और ‘मित्रो मरजानी’ जैसी कहानियां लिख दीं. जिसे लेकर उन पर कितने आघात-प्रतिघात हुए. उनके लेखन में किसी तरह का कोई इकहरापन नहीं है. समस्याओं के भीतर समस्या, गुत्थियों के भीतर गुत्थियां होती हैं, उनको भेदने की लगातार कोशिश उनकी रहती है. वे तभी लिखती हैं जब उनको लगता है कि लिखना अनिवार्य हो गया है. उन्होंने कम लिखा पर महत्वपूर्ण लिखा. यह शायद बहुत महत्वपूर्ण बात है कृष्णा जी के बारे में. अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहता हूं कि कृष्णा जी जैसे लेखक को पढ़ते रहना चाहिए और उनके बारे में अनुसंधान करते रहना चाहिए.
(बातचीत पर आधारित)

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