जयंती विशेष : राष्ट्रीय एकता के यशस्वी गायक पंडित भीमसेन जोशी

pandit bhimsen joshi : कर्नाटक के गडग में 1922 में आज के ही दिन पैदा हुए हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे अलबेले गायक पंडित जोशी को उनके माता-पिता ने भीमसेन गुरुराज जोशी नाम दिया था, लेकिन बाद में वह भीमसेन जोशी नाम से ही प्रसिद्ध हुए.

Pandit Bhimsen Joshi : इस देश की अनेकता में एकता की भावना को समर्पित और भारतीय होने का गर्व जताने वाला साढ़े तीन दशक से ज्यादा पुराना सदाबहार गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा…’ जब भी हमारे कानों में पड़ता है, तब जिस एक विभूति की सबसे ज्यादा याद आती है, उसे हम पंडित भीमसेन जोशी के नाम से जानते हैं. याद आये भी क्यों न, यह गीत इसी विभूति की दिलकश आवाज से आरंभ जो होता है.

कर्नाटक के गडग में 1922 में आज के ही दिन पैदा हुए हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे अलबेले गायक पंडित जोशी को उनके माता-पिता ने भीमसेन गुरुराज जोशी नाम दिया था, लेकिन बाद में वह भीमसेन जोशी नाम से ही प्रसिद्ध हुए. एक साक्षात्कार में उन्होंने ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ को ‘अपने जीवन का सबसे बड़ा अवार्ड’ बताते हुए कहा था कि इससे उन्हें इतनी प्रसिद्धि मिली कि वह सड़क पर निकलते, तो बच्चा-बच्चा उन्हें पहचानता.

यों, 1988 में लोक सेवा संचार परिषद द्वारा विकसित और दूरदर्शन व केंद्रीय सूचना मंत्रालय द्वारा प्रचारित-प्रसारित इस गीत के विभिन्न संस्करणों में और भी बहुत-सी शख्सियतों, हस्तियों व सितारों ने योगदान दिया है, पर यहां उन सबकी चर्चा का अवकाश नहीं है. हां, इतना और जान लेना जरूरी है कि इस गीत को पहली बार 1988 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद जारी किया गया और 22 साल बाद 2010 के गणतंत्र दिवस पर नयी पीढ़ी के कलाकारों के साथ ‘फिर मिले सुर मेरा तुम्हारा’ शीर्षक से दोबारा रिकॉर्ड किया गया था. इसके बावजूद इस गीत पर पंडित जोशी की कुछ ऐसी छाप है कि इसे अमर करने का सर्वाधिक श्रेय उन्हें ही दिया जाता है. जानकारों के अनुसार भीमसेन जोशी बचपन में ही गीत-संगीत की ओर आकृष्ट थे और 1933 में गुरु की तलाश में घर से निकल पड़े थे. वह तलाश अपने वक्त के जाने-माने उस्ताद और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिष्ठित किराना घराने के संस्थापक सवाई गंधर्व अब्दुल करीम खान पर पूरी हुई, तो उनके निर्देशन में वह अगले दो सालों तक बीजापुर, पुणे और ग्वालियर वगैरह में संगीत साधना करते रहे.


ग्वालियर में ही एक और उस्ताद हाफिज अली खान से बहुत से गुर सीखने के बाद उन्होंने अब्दुल करीम खान के शिष्य रामभाऊ कुंदगोलकर से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्रहण की और गडग वापस जाने से पहले निष्णात होने के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) व पंजाब भी गये. खयाल गायकी की बारीकियां उन्हें जिससे भी सीखने को मिलीं, उन्होंने सीखने में कोताही नहीं की.


इस लंबी साधना का सुफल यह हुआ कि 19-20 साल की उम्र से ही उन्हें मंचीय प्रस्तुतियों की मार्फत अपनी प्रतिभा दिखाने के मौके मिलने लगे. कन्नड़ और हिंदी धार्मिक गीतों का उनका पहला एलबम भी 20-21 साल का होते-होते बाजार में आ गया था. वर्ष 1943 के आसपास के संघर्ष वाले दिनों में उन्होंने मुंबई में रेडियो कलाकार के तौर पर भी काम किया. इससे पहले एक बार ऐसा भी हुआ कि वह बीजापुर जाने के लिए घर से निकले, तो उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि टिकट खरीद लेते. बहुत विचारने के बाद उन्होंने बिना टिकट यात्रा का जोखिम उठाने का फैसला किया और ट्रेन में जा बैठे.

उनका दुर्भाग्य कि थोड़ी ही देर में ट्रेन में टीटीइ आ पहुंचा और यात्रियों के टिकट चेक करने लगा. वह उनके पास आया, तो उन्होंने उससे साफ-साफ बता दिया कि उनके पास पैसे नहीं थे, इसलिए टिकट नहीं लिया. बदले में वह चाहे, तो वह उसे कुछ गाकर सुना सकते हैं. टीटीइ सहमत हो गया, तो उन्होंने उसे राग भैरव में ‘जागो मोहन प्यारे’ और ‘कौन-कौन गुन गावे’ सुनाया. फिर तो चमत्कार ही हो गया, टीटी उनसे टिकट के पैसे या जुर्माना वगैरह क्या वसूलता, गद्गद सहयात्रियों ने उनकी ओर से इस सबकी भरपाई कर देने का प्रस्ताव किया, तो वह खिसियाता हुआ-सा चुपचाप दूसरे कोच में चला गया. इसके बाद सहयात्री उन्हें खिलाते-पिलाते आदरपूर्वक बीजापुर ले गये.

अनंतर, उन्होंने अपनी संगीत साधना से जो नया इतिहास रचा उसकी चमकदार रोशनी जाने कितनी पीढ़ियों की पथ-प्रदर्शक बनकर उन्हें आलोकित करती रहने वाली है. वृद्धावस्थाजनित असमर्थताओं और लंबी बीमारी के बाद 25 जनवरी, 2011 को 89 साल की उम्र में पुणे के एक अस्पताल में इस संसार को अलविदा कहने से तीन साल पहले इसके लिए कृतज्ञ देश उनको अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से विभूषित कर चुका था. पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्म विभूषण और कर्नाटक रत्न समेत कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार पहले से ही उनकी झोली में थे. राष्ट्रीय संगीत, नृत्य व नाटक अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार मानी जाने वाली संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप भी. वह स्वयं को अपने क्षेत्र की श्रीमती केसरबाई केरकर, बेगम अख्तर और उस्ताद अमीर खान जैसी हस्तियों से बहुत प्रभावित बताते थे और आजीवन अपने गुरु के किराना घराने को नयी ऊंचाइयों पर ले जाने में लगे रहे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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