विकास के लिए जरूरी है सस्ते कर्ज पर पूंजी की उपलब्धता

RBI: भारतीय रिजर्व बैंक कर्ज की लागत कम करने के लिए बॉन्ड की निरंतर खरीदारी कर रहा है. अप्रैल, 2025 से अब तक रिजर्व बैंक ने ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) के जरिये पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक का बॉन्ड खरीदा है, ताकि बैंकिंग प्रणाली में नकदी बढ़ाकर कर्ज की ब्याज दर कम की जा सके.

RBI: भारतीय रिजर्व बैंक कर्ज की लागत कम करने के लिए बॉन्ड की निरंतर खरीदारी कर रहा है. सरकारी बॉन्ड एक प्रकार की सरकारी प्रतिभूति है, जिसे राज्य और केंद्र सरकारें अपने खर्चों की पूर्ति के लिए जारी करती हैं, जिसे निवेशक खरीदते हैं और उनके ऊपर एक निश्चित ब्याज दिया जाता है. इस तरह, सरकार इसके माध्यम से परियोजनाओं, कल्याणकारी योजनाओं और विकास कार्यों को वित्तपोषित करने के लिए बाजार से पैसा इकट्ठा करती है. अप्रैल, 2025 से अब तक रिजर्व बैंक ने ओपन मार्केट ऑपरेशन (ओएमओ) के जरिये पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक का बॉन्ड खरीदा है, ताकि बैंकिंग प्रणाली में नकदी बढ़ाकर कर्ज की ब्याज दर कम की जा सके. हालांकि, बॉन्ड के प्रतिफल में तेजी आने से रिजर्व बैंक के सामने चुनौती बनी हुई है, क्योंकि बॉन्ड का ब्याज दर अधिक होने से कर्ज-ब्याज दर में कमी की संभावना कम है. चूंकि बॉन्ड के प्रतिफल बढ़ रहे हैं, इसलिए कर्ज की लागत में अपेक्षानुसार कमी नहीं आ पा रही है.

मौजूदा स्थिति में बॉन्ड के प्रतिफल में वृद्धि के कारण बैंकों के लिए सस्ती पूंजी जुटाना महंगा हो गया है. इस कारण गृह, वाहन और कॉरपोरेट ऋण की दरें उच्च स्तर पर हैं, जो निवेश, खपत और विकास की गति को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही हैं. इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक सरकारी बॉन्ड खरीदने में रुचि दिखा रहा है. इसके अतिरिक्त, विदेशी बाजार में सोने-चांदी की बढ़ती कीमतों और वैश्विक बाजार में अनिश्चितता, भू-राजनीतिक संकट और ट्रंप की नीतियों के कारण विदेशी निवेशक लगातार अपने निवेश की निकासी कर रहे हैं, जिससे केंद्रीय बैंक पर बैंकिंग प्रणाली में नकदी बढ़ाने का दबाव बढ़ गया है. ओएमओ नकदी प्रबंधन का एक अहम उपकरण है.

जब बाजार में नकदी की कमी होती है, तब केंद्रीय बैंक सरकारी बॉन्ड खरीदकर बैंकों को नकदी उपलब्ध कराता है. इससे बैंकिंग प्रणाली में पूंजी का संचार होता है, जिससे वे जरूरतमंदों को ऋण दे सकते हैं और उद्योगपतियों, छोटे व्यवसायियों और आम जनता के लिए ऋण लेना आसान हो जाता है. बता दें कि ओएमओ के माध्यम से अप्रैल, 2024 से अब तक बैंकिंग प्रणाली में 7.7 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली जा चुकी है, और रेपो दर में 1.25 प्रतिशत की कमी भी की गयी है. उधर राज्य सरकारें बाजार से निरंतर उधारी ले रही हैं, जिससे नकदी पर दबाव बना हुआ है.

बैंकों के सामने मौजूदा सस्ती पूंजी के संकट के कई कारण हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है बैंक जमा पर ब्याज दर का कम होना, सरकार द्वारा बैंक जमा को भी आयकर के दायरे में लाना, निवेशकों के सामने निवेश के अन्य आकर्षक विकल्प जैसे शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड आदि का उपलब्ध होना. एक और बड़ा कारण है बैंककर्मियों द्वारा बीमा के विभिन्न उत्पादों को बेचने का प्रयास, जिसकी एकमुश्त राशि या किस्त बैंक ग्राहक अपनी बैंक जमा में से देते हैं, जिससे बैंक जमा में कमी आती है. इन कारणों से वर्तमान में बैंक जमा से निवेशकों का मोहभंग हुआ है.

बीते वर्षों में सोने-चांदी की कीमतों में आ रही तेजी की वजह से भी बैंक जमा कम हो रहे हैं. बैंकों की जमा और कर्ज वृद्धि दर में एक लंबे समय से बड़ा अंतर बना हुआ है. अर्थात, बैंक की जमा की वृद्धि दर कर्ज की वृद्धि दर के अनुपात में कम है, जिससे बैंक के सामने सस्ती पूंजी का संकट खड़ा हो गया है. बैंक जमा दो प्रकार का होता है. पहला है बचत और चालू खाता. दूसरा है मियादी जमा. बैंक बचत खातों पर ग्राहकों को 2.5 प्रतिशत से सात प्रतिशत तक ब्याज देता है. चालू खातों पर कोई ब्याज देय नहीं होता है, जबकि मियादी जमा पर बैंक औसतन पांच से आठ प्रतिशत तक ब्याज देते हैं.

जमा में वृद्धि की दर 12 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में सालाना आधार पर नरम होकर 9.7 प्रतिशत रह गयी है, जबकि ऋण में वृद्धि बढ़कर 11.7 प्रतिशत हो गयी है. इस कारण ऋण और जमा के बीच वृद्धि का अंतर 200 आधार अंकों का हो गया है. पुनश्च:, रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, बैंकों द्वारा दी गयी ऋण राशि 12 दिसंबर तक बढ़कर 196.5 लाख करोड़ रुपये हो गयी है, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 175.86 लाख करोड़ रुपये से अधिक है. इस पखवाड़े में ऋण 1.2 लाख करोड़ रुपये बढ़ा है. वहीं, समान अवधि में कुल जमा 242.14 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो एक वर्ष पहले 220.06 लाख करोड़ रुपये था.

हालांकि, पखवाड़े के दौरान जमा में 45,344 करोड़ रुपये की कमी आयी है. इससे पहले 28 नवंबर को समाप्त पखवाड़े में ऋण वृद्धि 11.5 प्रतिशत और जमा वृद्धि 10.2 प्रतिशत थी. अंत में, आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने, विकास दर बढ़ाने और 2047 तक देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने के स्वप्न को साकार करने के लिए सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक को सस्ते ऋण पर पूंजी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी होगी. साथ ही, बैंकों को भी कम ब्याज दरों पर जमा बढ़ाने के लिए एक नये मॉडल पर काम करना चाहिए, जो सस्ती पूंजी को आकर्षित कर सके. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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