सत्ता के गलियारे की भुनभुनाहट

एक माह में तेल कंपनियों ने कीमतों में दर्जन बार से ज्यादा बढ़ोतरी की है, जबकि कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय बाजार या तो स्थिर है या नीचे जा रहा है.

ज्यादा जोगी मठ उजाड़. एनडीए नेतृत्व को अंतत: समझ में आ गया कि महामारी प्रबंधन पर भाजपा के आक्रामक और कड़वे महाप्रचार से सरकार को कोई प्रशंसा हासिल नहीं हो रही है. कोविड की समझ से दूर-दूर तक वास्ता नहीं रखनेवाले भी बिना किसी हिदायत के सरकार का बचाव कर रहे हैं. विपक्ष के हमलों को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने वाचाल मंत्रियों को कोरोना पर चुप रहने को कहा है.

केवल स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ही स्थिति के बारे में बतायेंगे. वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (अभी इन्हें बोलना है) मीडिया को ऑक्सीजन की आवाजाही के बारे में जानकारी देंगे. रसायन एवं उर्वरक मंत्री सदानंद गौड़ा जरूरी दवाओं की आपूर्ति के बारे में बतायेंगे. लेकिन गोयल और गौड़ा के बयान उतने ही उपयोगी रहे हैं, जितना कि बिना ऑक्सीजन के सिलेंडर.

कई वरिष्ठ मंत्रियों ने विरोधाभासी बयान दिये क्योंकि मंत्रालयों के बीच संवाद ही नहीं है. उदाहरण के लिए, सबसे प्रभावी मंत्रियों में एक नितिन गडकरी ने 18 मई को स्पष्ट कहा, ‘मांग अधिक और आपूर्ति कम होगी, तो समस्या होगी. इसलिए एक की जगह दस वैक्सीन कंपनियों को लाइसेंस देना चाहिए.’ चौबीस घंटे बाद अपनी बात से पीछे हटते हुए उन्होंने ट्वीट किया- ‘कल मैंने वैक्सीन उत्पादन बढ़ाने के लिए सलाह दिया था.

मुझे अपने भाषण से पहले पता नहीं था. मनसुख मंदाविया ने मुझे इस बारे में सरकार की कोशिशों की जानकारी दी.’ मंदाविया गौड़ा के मंत्रालय में राज्य मंत्री हैं और प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें कोरोना-संबंधी दवाओं की आपूर्ति के प्रबंधन का जिम्मा दिया है. मंत्रियों के बीच यह विरोधाभास कांग्रेस के लिए वरदान था. एजेंडा तय करनेवाले एनडीए ने कई एकालापों के बजाय एक सुर में बोलने का फायदा समझा है. अचरज की बात नहीं है कि अनेक अत्यधिक सक्रिय मंत्री और सोशल मीडिया पर राय रखनेवाले कहीं छुप गये हैं.

हालिया चुनाव में हारने के बाद कांग्रेस अभी तक संभल नहीं सकी है. चुनावी हार पर अशोक चव्हाण की रिपोर्ट ने असली खलनायकों को छोड़ कुछ क्षत्रपों को दोषी ठहराया है. हमेशा की तरह इस दस्तावेज को भी दफन कर दिया जायेगा. मामूली राजनीतिक राशन पर चल रहे कांग्रेस नेता बिना किसी की भावनाएं आहत किये एक साथ तीन गांधियों को संभालने में परेशान हैं. ऐतिहासिक रूप से पार्टी में परिवार के दो लोगों की चलती थी. कभी जवाहरलाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी की तूती बोलती थी.

पिता ने यह सुनिश्चित किया कि इंदिरा पार्टी की सबसे कम आयु की अध्यक्ष बनें. सत्तर के दशक के शुरू में संजय गांधी अपनी माता के सलाहकार हुए. उन्होंने एक समानांतर संगठन खड़ा किया और अस्सी के लोकसभा चुनाव में जीते हुए आधे से अधिक सांसद चुने. जहां बचे रहने के लिए पुरानी पीढ़ी को इंदिरा की जरूरत थी, वहीं पार्टी का बड़ा हिस्सा संजय का वफादार बन गया. उनकी मृत्यु के बाद इंदिरा-राजीव जोड़ी ने सरकार व पार्टी को नियंत्रित किया.

अपनी माता की हत्या के बाद राजीव ने दून स्कूल के अपने मित्रों और टेक्नोक्रेटों को मार्गदर्शन के लिए साथ लिया. कुछ साल के लिए वे अकेले गांधी थे, जिनका पार्टी पर पूरा नियंत्रण था. बाद में सोनिया गांधी उनकी अदृश्य सलाहकार हो गयीं. राजीव की हत्या के बाद वे कुछ समय के लिए चुप रहीं और 1998 में वे पार्टी प्रमुख के तौर पर वापस आयीं. साल 2004 तक शीर्ष पर वे अकेली गांधी थीं.

फिर राहुल अपनी माता के साथ आये और तब से शीर्ष पर यही दो गांधी थे. सोनिया सबको साथ लेकर चलनेवाली नेता हैं. राहुल कुछ समय के लिए पार्टी अध्यक्ष भी बने थे. अब प्रियंका गांधी के आने से समीकरण बदल गया है. परिवार की इस तिकड़ी को लेकर कांग्रेस समर्थक भ्रमित हैं. भाई व बहन के बीच जिम्मेदारियों का साफ बंटवारा न होने से पूरी पार्टी मझधार में है. उत्तर प्रदेश की प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी देशभर का दौरा करती रहती हैं. राहुल अपने पुराने राज्य से दूरी बरत रहे हैं. इन तीन गांधियों में सबसे शक्तिशाली कौन है? कांग्रेस नेता पंजाब और राजस्थान में विद्रोहियों के पीछे जी-शक्ति होने को लेकर माथापच्ची कर रहे हैं. पहली बार कांग्रेस गांधियों की बहुतायत से परेशान होती दिख रही है.

सेंट्रल विस्टा का असली खर्च क्या है? इसकी रूप-रेखा क्या है? इसके असली आकार और आयाम पर धूल उड़ने देने के बाद आखिरकार सरकार बचाव की मुद्रा में है. इसका खर्च 13 हजार करोड़ रुपया है, न कि 20 हजार करोड़ रुपया, जैसा कि सरकार के कुछ कहे बिना छपता रहा. यह राशि पांच सालों में खर्च होगी, न कि एक साल में और यह नयी संसद बनाने की अनुमानित लागत ही, जबकि सेंट्रल विस्टा विभिन्न उद्देश्यों के लिए होगा.

इस परियोजना में केंद्र सरकार के सभी कार्यालय, प्रधानमंत्री व उपराष्ट्रपति निवास तथा विश्व स्तरीय सम्मेलन केंद्र होंगे. निश्चित रूप से इसे एक कीमती परियोजना तथा राष्ट्र के लिए हमेशा रहनेवाले उपहार के रूप में होना है, लेकिन इतिहास इसे महामारी के बीच एक तुच्छ राजनीतिक तमाशे के रूप में दर्ज करेगा. कांग्रेस समेत विपक्ष विस्टा को केवल प्रधानमंत्री के अहं को तुष्ट करने के लिए हो रही समय और धन की बर्बादी कह रहा है. असल में, पूरा होने के बाद इसे इतिहास में सबसे नवोन्मेषी वास्तु उपलब्धियों में एक के रूप में रेखांकित किया जायेगा, जिसे भारतीयों ने भारतीयों के लिए परिकल्पित और विकसित किया है. यह सरकार का दावा है.

अब तक भारत मुगल या ब्रिटिश शासन के स्मारकों और भवनों के लिए जाना जाता है. पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में आग लगी हुई है, पर राजनीतिक पार्टियां इसे जल्दी बुझाने के लिए साथ नहीं आ रही हैं. वे महामारी की बेचैनी को लेकर और जवाबदेही मांगने के लिए एक-दूसरे से भिड़ी हुई हैं. व्यर्थ के ट्वीट व बयानों के अलावा कोई पार्टी पेट्रोल-डीजल की सौ रुपये तक जाती कीमत को घटाने के लिए आवाज नहीं उठा रही है. एक माह में तेल कंपनियों ने कीमतों में दर्जन बार से ज्यादा बढ़ोतरी की है, जबकि कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय बाजार या तो स्थिर है या नीचे जा रहा है.

जो राज्य कोरोना दवा से जीएसटी हटाने की मांग कर रहे हैं, वे तेल के करों में कमी पर चुप हैं. आम तौर पर केंद्र और राज्यों को पेट्रोलियम पदार्थों से बीस फीसदी से ज्यादा राजस्व आता है. लगभग आधी कीमत सरकार के जेब में जाती है. ऐसा लगता है कि लोगों का तेल से दोहन करने के लिए सभी सहकारी संघवाद के तहत एकजुट हो गये हैं.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >