आज की साइंस-टेक्नोलॉजी को देखें, तो साफ पता चलता है कि इसकी नकेल कॉरपोरेट सेक्टर के हाथों में है. इसका रुख पर्यावरण विरोधी, ध्वंसात्मक और विलासिता की ओर है. हम दूर-दराज के ग्रहों की तो कई तरह की खोज-खबर लेते रहते हैं, लेकिन आस-पास के किसी गली-मोहल्ले में भूख से बिलबिलाते किसी बच्चे की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है.
अजीब बात है कि गॉड पार्टिकल की खोज में अरबों रुपये की प्रयोगशाला में हजारों वैज्ञानिक लगे हुए हैं, लेकिन प्लास्टिक और पॉलीथिन से पटी दुनिया पर किसी की नजर नहीं जाती. कार और हवाई जहाज के एक से एक मॉडल बन रहे हैं लेकिन ट्रैफिक जाम से परेशान लोगों का चेहरा कोई नहीं देखता. अगर सत्य की खोज को विज्ञान कहते हैं, तो अगल-बगल के सत्य को प्राथमिकता हम क्यों नहीं देते?
विनय भट्ट, हजारीबाग
