अनुज सिन्हा
वरिष्ठ संपादक
प्रभात खबर
आज 543 सदस्यों में सिर्फ 59 महिलाएं हैं. अगर विधेयक पारित हो गया होता, तो 16वीं लोकसभा में कम से कम 179 महिला सांसद चुन कर आतीं. यानी अभी से तिगुनी. अब तो चुनाव के बाद पता चलेगा कि कितनी महिलाएं चुन कर आती हैं. यह दलों पर निर्भर है कि वे कितनी महिलाओं को मैदान में उतारते हैं.
शुक्रवार को 15वीं लोकसभा के अंतिम सत्र का अंतिम दिन भी बीत गया. लेकिन, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देनेवाला विधेयक नहीं लाया जा सका. उम्मीद थी कि शायद राजनीतिक दलों को सद्बुद्धि आये, उनका विरोध कम हो और महिलाओं को अधिकार देने की हिम्मत करते हुए वे महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा से पास करा दें. ऐसा हुआ नहीं. सपा, राजद, बसपा तो इस विधेयक के मूल स्वरूप के विरोध में हैं ही, लेकिन इसका समर्थन करनेवाले बड़े राजनीतिक दलों की मंशा पर भी सवाल उठता है.
क्या कांग्रेस और भाजपा चाहतीं, तो महिला आरक्षण विधेयक (108वां संविधान संशोधन विधेयक) पारित नहीं कराया जा सकता था. संसद के गेट को बंद कर, लोकसभा से लाइव प्रसारण बंद कर जब तेलंगाना विधेयक को पारित कराया जा सकता है, तो महिला आरक्षण विधेयक क्यों नहीं? लेकिन इसके लिए राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति होनी चाहिए. मंशा साफ होनी चाहिए. आज स्थिति यह है कि 543 सदस्यों में सिर्फ 59 महिलाएं हैं. अगर विधेयक पारित हो गया होता तो 16वीं लोकसभा में कम से कम 179 महिला सांसद चुन कर आतीं. यानी अभी से तिगुनी. अब तो चुनाव के बाद पता चलेगा कि कितनी महिलाएं चुन कर आती हैं.
यह राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी महिलाओं को मैदान में उतारते हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सर्वाधिक 44 और कांग्रेस ने 43 महिलाओं को टिकट दिया था. सपा ने आठ, तृणमूल कांग्रेस ने पांच (पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी), एआइडीएमके ने दो (पार्टी प्रमुख जयललिता) और बसपा ने 28 (पार्टी प्रमुख मायावती) महिलाओं को प्रत्याशी बनाया था. ठीक है कि महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं हुआ है, लेकिन अगर राजनीतिक दल एक-तिहाई सीटों पर महिलाओं का उतारना चाहें तो संविधान इसमें कहां आड़े आता है? यही तो राजनीतिक दलों के लिए परीक्षा की घड़ी है. टिकट बंटने के समय ही उनका असली चेहरा सामने आयेगा.
हाल में देश की राजनीति में महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है. कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी, विपक्ष (भाजपा) की नेता सुषमा स्वराज, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार तीनों ताकतवर महिलाएं हैं. आगामी चुनाव के बाद ममता बनर्जी, जयललिता और मायावती के दल यह तय करेंगे कि केंद्र में किसकी सरकार बनेगी. कौन होगा प्रधानमंत्री. इतनी ताकतवर महिलाओं के रहते महिला आरक्षण विधेयक का पारित नहीं होना दुखद है. ठीक है कई दल विरोध कर रहे हैं. वे चाहते हैं कि महिलाओं में भी यह तय हो कि किस वर्ग को कितना आरक्षण मिले. इस विधेयक को रोकने के लिए 1998 में राजद के एक सांसद ने अध्यक्ष के हाथ से लेकर बिल फाड़ दिया था. एक बार समाजवादी पार्टी के एक नेता जब विधेयक को छीनने का प्रयास कर रहे थे तो रेणुका चौधरी ने उन्हें धक्का देकर हटाया था.
अब महिलाओं को और मुखर होना पड़ेगा. हक ऐसे नहीं मिलता. कभी-कभी छीनना पड़ता है. इसलिए महिलाओं को राजनीतिक दलों पर दबाव बनाना पड़ेगा कि वे अधिक से अधिक टिकट महिलाओं को दें. संभव हो तो 33 फीसदी. ऐसा निर्णय करना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं है. हर दल किसी भी हाल में चुनाव जीतना चाहता है. किसी दल के पास बड़ी संख्या में महिला प्रत्याशी हैं नहीं जो जीत सुनिश्चित कर सकें.ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि उन्हें पहले से मौका ही नहीं मिला है. अगर महिला आरक्षण कानून बन गया होता, तो 33 फीसदी टिकट देना राजनीतिक दलों की मजबूरी होती.
राजनीतिक दल अगर हिम्मत नहीं दिखाते हैं, महिलाओं को टिकट नहीं देते हैं, तो इस चुनाव के बाद भी महिला सांसदों की संख्या 45-65 के बीच होगी. सच तो यह है कि भ्रष्टाचार के मामले में जितने भी सांसदों को बरखास्त किया गया, स्टिंग में सांसद पकड़े गये, किसी में एक भी महिला सांसद का नाम नहीं हैं. अगर मौका मिले तो ये महिलाएं बेहतर सांसद साबित होंगी, लेकिन पहले उन्हें राजनीतिक दल मौका तो दें.
