देश की आत्मा गायब है पीएम की रेस से

।। पुण्य प्रसून वाजपेयी ।। वरिष्ठ पत्रकार क्या यह मान लिया जाये कि देश की राजनीति वैचारिक तौर पर सबसे ज्यादा दिवालियापन वाले हालात को जी रही है? या फिर पहली बार देश के सामने यह मौका आया है कि 2014 के चुनाव के सहारे पारंपरिक राजनीति को ही पलट दिया जाये? इस साल का […]

।। पुण्य प्रसून वाजपेयी ।।

वरिष्ठ पत्रकार

क्या यह मान लिया जाये कि देश की राजनीति वैचारिक तौर पर सबसे ज्यादा दिवालियापन वाले हालात को जी रही है? या फिर पहली बार देश के सामने यह मौका आया है कि 2014 के चुनाव के सहारे पारंपरिक राजनीति को ही पलट दिया जाये? इस साल का जनादेश सिर्फ दिल्ली की सत्ता तय नहीं करेगा, दिल्ली की सत्ता पर जो भी बैठे उसकी दिशा क्या हो यह भी तय करेगा. यह सवाल इसलिए बड़ा हो चला है, क्योंकि पहली बार सत्ता की दौड़ में विचारधारा गायब है. इस दौड़ में समाजवाद नहीं है. ‘मनमोहनोमिक्स’ के पीछे खड़े कॉरपोरेट का इरादा पाला बदल कर मोदी खेमे में जाने का है.

‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ का विरोध करते हुए पूंजीवाद के पक्ष में खड़े केजरीवाल हैं. तो 2014 का जनादेश क्या तय करनेवाला है, इसके जबाब से पहले जरा वक्त के कुछ पन्ने पलट लें.

नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक, कांग्रेस के पास राजनीति की एक धारा थी, जिसका अंत हर नयी विरासत के साथ खड़ा हो जाता था. लेकिन पहली बार कांग्रेस की धारा नहीं, बल्कि आर्थिक सुधार की वह धारा खत्म हो रही है, जिसने कांग्रेस को दस बरस तक टिकाये रखा और जैसे ही जनता के अखाड़े में जाने का सवाल आया, हार्वर्ड से लेकर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तक के तीन धुरंधर अर्थशास्त्री झटके में बदल गये.

मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम और एमएस अहलूवालिया की तिकड़ी ने बीते दस बरस में अपनी इकोनॉमिक्स से आर्थिक सुधार की जो हवा बहायी, उसमें आवारा पूंजी ने कैसे समाज में असमानता पैदा की और कैसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ विकास का प्रतीक बन गयी यह किसी से छुपी तो नहीं, लेकिन जब चुनाव दस्तक दे रहा है तब हाशिये पर पड़े तबकों की सुध आ गयी.

जरा ध्यान दीजिये, जो 10 मंत्रालय चिदंबरम के लिए जरूरी हो गये, उनमें अल्पसंख्यक, आदिवासी, महिला, परिवार कल्याण, स्वास्थ्य, पंचायती राज, ग्रामीण विकास, सामाजिक न्याय से लेकर पीने के पानी तक से जुड़े मंत्रालय शामिल हैं. सवाल यह नहीं है कि ‘मनमोहनोमिक्स’ अब हाशिये पर पड़े तबकों को लेकर बैचेनी क्यों दिखा रही. सवाल है कि खुली बाजार अर्थव्यवस्था का जो खाका 1991 में मनमोहन सिंह ने देश में रखा और बतौर पीएम जिस इकोनॉमिक्स के जरिये दुनिया में भारत को अव्वल बनाने का सपना पाला, वह चुनावी आहट के साथ क्यों टूटता सा दिख रहा है?

दूसरा सवाल है कि 2004 से 2014 के दौर में जिस तरह भारत की कंपनियां बहुराष्ट्रीय हो गयीं और दुनिया के बाजार में पैसा लगाने लगी, क्या वह ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के अंत की शुरुआत है? क्योंकि बीते 10 बरस का एक सच यह भी है कि कॉरपोरेट के अनुसार ही देश के हर मंत्रालय की नीतियां बनने लगीं. जिन मंत्रलयों ने कॉरपोरेट के जरिये देश के कथित विकास को गति दी, उसे पीएम मनमोहन सिंह ने अव्वल माना.

इसी दौर में देश की खनिज संपदा औने-पौने दाम में निजी हाथों में दे दी गयी. कोयला हो या गैस, बिजली उत्पादन हो या खनन, हर जगह लूट. दसवें बरस के अंतरिम बजट में संभवत: दामन के दाग छुपाने के लिए ही चिदंबरम को कहना पड़ा कि कोयला खनन से उत्पादन बढ़ा है. प्राकृतिक गैस कुओं से उत्पादन जारी है. परमाणु रियेक्टर जल्द काम करेंगे.

पर जिस तरह बाजार के हाथों में सबकुछ सौंपने का सिलसिला शुरू हुआ है, उससे देश के उपभोक्ता और नागरिकों के बीच कैसे लकीर खिंच गयी और कैसे सरकार के सरोकार आम आदमी से खत्म होते जा रहे हैं, इस पर बीते दो दशक से किसी ने ध्यान नहीं दिया. इसी कारण मौजूदा वक्त में जीडीपी में खेती का योगदान 17 फीसदी और औद्योगिक उत्पादन का योगदान 23 फीसदी है, जबकि सर्विस सेक्टर की भूमिका बढ़ते-बढ़ते 60 फीसदी तक जा पहुंची है.

हर हाथ में मोबाइल या चुनावी लैपटॉप है, लेकिन सरकार चार्जर तक का उत्पादन नहीं कर पा रही है. ऐसे में रोजगार पैदा हो तो कैसे और रोजगार नहीं मिलने पर युवा तबके का आक्रोश निकले किस पर, यह सवाल किसी राजनीतिक दल के जेहन में नहीं है. खुले बाजार की थ्योरी में हर राजनीतिक दल की राजनीति बाजार के सामने बौनी हो चली है.

तो तीन सवाल देश के सामने है. पहला, क्या देश अब वैकल्पिक राजनीति के लिए तैयार है? दूसरा, क्या वैकल्पिक राजनीति का मतलब सिर्फ सत्ता परिवर्तन है? और तीसरा, क्या संसदीय राजनीति को लेकर जनता में आक्रोश इस हद तक है कि वह मौजूदा राजनीतिक दल से इतर किसी को चुनने के लिए तैयार है? ये तीनों सवाल इसलिए बड़े हैं, क्योंकि चिदंबरम का अंतरिम बजट भी 2104 के लोकसभा चुनाव को देख रहा है और अंतरिम बजट खारिज करनेवाले भाजपाइयों से लेकर वामपंथियों तक के बयान भी चुनाव के मद्देनजर आ रहे हैं.

सत्ता बदलने से भी कोई परिवर्तन नहीं होगा, यह भी 2014 के मद्देनजर वैकल्पिक राजनीति का ज्ञान देनेवाली आम आदमी पार्टी कह रही है. तो क्या यह मान लिया जाये कि देश की राजनीति वैचारिक तौर पर सबसे ज्यादा दिवालियापन वाले हालात को जी रही है? या फिर पहली बार देश के सामने यह मौका आया है कि 2014 के चुनाव को ही देश की नीतियों के आसरे उठा कर पारंपरिक राजनीति को ही पलट दिया जाये?

यह सवाल जरूरी क्यों है, इसे समझने के लिए उस आंकड़े को ही देख लें, जिसे ब्रिटिश फर्म ने पिछले बरस दुनिया के सामने रखा. रिपोर्ट के मुताबिक इस वक्त भारत में सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करने वाला क्षेत्र है प्राइवेट सेक्योरिटी. दूसरे नंबर पर है लिफ्ट में बैठा लिफ्टमैन. यानी जिस देश में उच्च शिक्षा को लेकर कसीदे गढ़े जाते हों और दुनिया भर में सॉफ्टवेयर से लेकर मैनेजमेंट तक में भारतीय छात्रों की धूम का जिक्र होता हो, उस देश में रोजगार को लेकर क्लर्क पैदा करने से भी बुरे हालात हो चुके हैं. किसान और ग्रामीण तो बीते छह बरस में कॉरपोरेट के धंधों के फैलाव में अपनी जमीन गंवाते चले गये.

देश में बिल्डर से लेकर कॉरपोरेट घरानों तक की आय में 900 गुना की औसत वृद्धि सिर्फ 6 बरस में हो गयी. ऐसे में क्या 2014 का चुनाव ‘मनमोहनोमिक्स’ की धारा का खात्मा है या भाजपा इसी धारा को ही नये सिरे से अपनायेगी? जो केजरीवाल मुकेश अंबानी का नाम लेकर 2014 के जनादेश को अंबानी बनाम हिंदुस्तानी बनाना चाहते है, वह भी सीआइआइ में जाकर फिसल जाते हैं. पूंजीवाद के पक्ष में खड़े होने से कतराते नहीं हैं, जबकि पहली बार देश चुनाव के जरिये परिवर्तन देखना चाहता है.

तो क्या देश के हालात चुनाव के बाद महात्मा गांधी के ‘हर हाथ को काम’ पर लौटेंगे, या संघ के स्वदेशी चिंतन की दिशा में सोचेंगे, या नेहरू की मिक्स इकोनॉमी के युग में लौटेंगे, जहां खेती, उद्योग और सर्विस सेक्टर पर समान नजर होगी? इंतजार करना होगा, क्योकि पहली बार सत्ता या गवर्नेस का मतलब 7-आरसीआर पर दस्तक देना भर नहीं है, रायसीना हिल्स पर बैठ देश की आत्मा को आत्मसात करना है. यह पीएम के लिए दौड़ते, भागते, हांफते उम्मीदवारों में नजर नहीं आता.

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