क्या होगा फेडरल फ्रंट का भविष्य?

भारत की राजनीति इन दिनों दो ध्रुव की तरफ बढ़ती नजर आ रही है. पहला कांग्रेस और दूसरा भाजपा. लेकिन इन दो ध्रुवों के इतर एक तीसरा कोण भी फेडरल फ्रंट के रूप में आकार लेने लगा है. इसका मकसद कांग्रेस और भाजपा को केंद्र की सत्ता में आने से रोकना है. लेकिन दिलचस्प बात […]

भारत की राजनीति इन दिनों दो ध्रुव की तरफ बढ़ती नजर आ रही है. पहला कांग्रेस और दूसरा भाजपा. लेकिन इन दो ध्रुवों के इतर एक तीसरा कोण भी फेडरल फ्रंट के रूप में आकार लेने लगा है. इसका मकसद कांग्रेस और भाजपा को केंद्र की सत्ता में आने से रोकना है.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस फ्रंट में शामिल 11 पार्टियों में शायद ही कोई नेता हो जो देश का प्रधानमंत्री बनना नहीं चाहता हो. हालांकि यह देश में कोई पहला प्रयोग नहीं है. इस तरह के प्रयोग तो आपातकाल के बाद से ही होते आ रहे हैं. लेकिन अब तक ऐसी कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी है.

चाहे वह मोरारजी देसाई की सरकार हो या वीपी सिंह की. इस क्रम में चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल की भी सरकारें आयीं-गयीं. भारतीय राजनीति में शायद यह पहला मौका है जब गैर कांग्रेस और गैर भाजपा सरकार के लिए ‘फेडरल फ्रंट’ बन रहा है. लेकिन इस फ्रंट को जानने-समझने वाले लोग जानते ही हैं कि इस तरह के राजनीतिक गंठजोड़ सिर्फ भाजपा को सत्ता में आने से रोकने और कांग्रेस को मदद पहुंचाने के लिए बनाये जाते हैं. गैर कांग्रेसी सरकारों में चरण सिंह, चंद्रशेखर और गुजराल की सरकार तो कांग्रेस की बैसाखी पर ही खड़ी हो पायी, हालांकि कांग्रेस ने इन सरकारों को चलने में सहयोग नहीं किया.

नतीजतन, ये सरकारें लड़खड़ा कर गिर गयीं. जहां तक भाजपा का सवाल है, तो मोरारजी की सरकार को जनसंघ और वीपी सिंह की सरकार को भाजपा का साथ मिला. लेकिन इनका हश्र किसी से छिपा नहीं है. देखना यह है कि वर्तमान में कुल मिला कर 92 सीटों वाला यह फ्रंट 273 का आंकड़ा कैसे छूता है और अगर यह हो भी जाता है तो इनका पीएम कौन होगा.

प्रो. शैलेंद्र मिश्र, ओरमांझी, रांची

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