कांग्रेस के कायाकल्प की कामना से लिखे गये ‘दर्शक’ के विशेष, लंबे आलेख का अध्ययन आंख खोलने वाला लगा. घोटाले ही घोटाले नजर आये. आपकी भद्र सम्मति के अनुरूप इस 128 वर्षीया ‘बूढ़ी कांग्रेस’ क्या कायाकल्प होगा! कारण कि आज राहुल गांधी डूबते जहाज के बेबस कप्तान लग रहे हैं. कभी-कभार भ्रष्टाचार पर चाहे जो भड़कें, उनके कब्जे में कांग्रेस कतई नहीं है. आपका यह आकलन सच की खुशबू लिये है.
लेकिन कई सवाल सामने हैं. आखिर राहुल के लिए कांग्रेस को संभालने का विशेषाधिकार उत्तराधिकार जैसा नहीं है? अगर वे सोनिया गांधी के पुत्र नहीं होते तो पार्टी उपाध्यक्ष बन जाते क्या? ‘वंशवादी दल’ के रूप में कांग्रेस नहीं बदलती तो उसका क्या वजूद होता? इस हाल में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी और एक वंश में सिमटी यह पार्टी आम आदमी से दूर जाती लग रही है.
मंत्रमुदित, ई-मेल से
