आदिकाल से ही शिक्षा इनसान के जीवन में बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है. आज की स्थिति यह है कि शिक्षा के बिना किसी भी तरह के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती. अच्छी बात यह है कि बिहार सरकार इस जरूरत को समझ रही है. वर्ष 2014-15 के बजट में सरकार ने शिक्षा को खास महत्व देकर अत्यंत जिम्मेवारीपूर्ण तरीके से कामकाज के अंदाज का परिचय दिया है.
इससे कम-से-कम यह ध्वनित होता है कि यह सरकार न केवल आज की, बल्कि आनेवाले कल की बिहार की जरूरतों को भी बखूबी समझती है. कहने की जरूरत नहीं कि अगर आजादी के बाद से लगातार राज्य की सरकारों ने इस दिशा में गंभीरता का परिचय दिया होता, तो आज की स्थिति कुछ और होती. पर, देर से ही सही, इस जरूरत को मौजूदा सरकार ने महसूस किया है.
अगले साल के बजट में शिक्षा पर 12,258 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है. यह रकम इसी मद में पिछले वर्ष की राशि की तुलना में करीब 136 प्रतिशत अधिक है. अर्थात् वर्तमान वित्तीय वर्ष के बजट से दोगुने से भी ज्यादा. इतना ही नहीं, शिक्षा के मद में सरकार ने बजट का जो आकार पेश किया है, वह उसके किसी भी दूसरे विभाग की तुलना में आगे है. यानी प्राथमिकता सूची में नंबर एक पर. अब, बजट के बाद सरकार को इस बात पर खास ध्यान देना होगा कि इतनी बड़ी रकम का व्यय प्रबंधन कैसे किया जाये, ताकि कड़ी मेहनत से जुटायी जानेवाली इस रकम की एक-एक पाई सही जगह पर सही तरीके से ही खर्च हो. इससे बदलाव की उम्मीदें सरकार की अपेक्षा के अनुरूप मूर्त रूप ले सकेंगी.
ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि बिहार के पास दूसरे विकसित प्रदेशों की तरह खनिज और उद्योग-धंधे नहीं हैं. मानव संसाधन ही उसकी पूंजी है. यदि मानव संसाधन का कौशल विकास हो, बाजार की नयी जरूरतों के अनुरूप संस्थान खड़े किये जायें और रोजगार के अवसर सृजित किये जायें, तो इसी पूंजी के बल पर बिहार तरक्की की राह पर आगे बढ़ सकता है. प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में अभी भी चुनौतियां बरकरार हैं. बजट आकार बढ़ने के बाद यह उम्मीद की जानी चाहिए कि स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात को दुरुस्त करने के साथ-साथ पढ़ाई की गुणवत्ता बढ़ने पर भी खास ध्यान दिया जायेगा.
