कोई नियम यदि हकीकत की अनदेखी करके बने, तो ढंके-छुपे उसका उल्लंघन तय है. अपने आकार और आबादी की विशालता के आधार पर भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. देश के कई लोकसभा क्षेत्र आकार और मतदाताओं की संख्या के मामले में यूरोप के कुछ देशों से बड़े हैं. चुनाव सिर्फ मतदान केंद्रों पर जाकर इवीएम के बटन दबाने भर का नाम नहीं है.
वह प्रत्याशियों के द्वारा अपने संदेश व पार्टी के विचार को निर्धारित क्षेत्र में सफलतापूर्वक ले जाने और सघन जनसंपर्क का भी नाम है. इससे यह सुनिश्चित होता है कि मतदाता प्रत्याशियों का चयन करते वक्त उनके सोच, प्राथमिकता और कार्यशैली को लेकर आश्वस्त हों तथा विवेक अनुसार प्रत्याशियों के एजेंडे के बारे में फर्क कर सकें. क्षेत्र विशाल हो और मतदाता बहुविध, तो संदेशों का सफलतापूर्वक संचार अपने अनुकूल खर्च की भी मांग करता है. इस खर्च से सिर्फ यह कह कर इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव खर्च को ज्यादा रखने से चुनाव प्रक्रिया में कदाचार बढ़ेगा.
इस लिहाज से लोकसभा और विधानसभा चुनावों के प्रत्याशियों के लिए चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाने की चुनाव आयोग की यह सिफारिश स्वागतयोग्य है. आयोग ने 2011 में लोकसभा चुनावों के प्रत्याशियों के लिए चुनाव खर्च की सीमा 25 लाख रुपये से बढ़ा कर 40 लाख की थी, जिसे अब 70 लाख करने की सिफारिश की गयी है. हालांकि इतनी राशि भी कम ही कही जायेगी. वक्त के साथ देश में राजनीति की प्राथमिकताएं ही नहीं, प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि और चुनावों की प्रकृति भी बदली है. आज राजनीति पहले की तुलना में बाजार के हितों के ज्यादा करीब है और प्रत्याशियों में भी करोड़पतियों की संख्या बढ़ी है.
जनसंचार के बदलते साधनों के साथ चुनाव-प्रचार छवि प्रधान, प्रौद्योगिकी आधारित और विशेष प्रबंधन की मांग करनेवाला हो चला है. अगर चुनावों की प्रकृति बदली है, तो उसी के अनुकूल खर्चे की सीमा भी तय होनी चाहिए. साथ में सोचा यह भी जाना चाहिए कि निर्वाचन क्षेत्र तुलनात्मक रूप से छोटे हों. लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों की संख्या बढ़े, तो चुनाव खर्च की वास्तविक जरूरत को कम रखने और प्रत्याशियों में आम लोगों की संख्या बढ़ा कर देश के लोकतंत्र को ज्यादा समावेशी बनाने में मदद मिल सकती है.
