।। शुजात बुखारी ।।
एडिटर, राइजिंग कश्मीर
उम्मीद है कि दिल्ली में नयी सरकार आने के बाद दोनों देश न सिर्फ कश्मीर मसले को सुलझाने के बड़े लक्ष्य की ओर अग्रसर होंगे, बल्कि अन्य समस्याओं पर भी ध्यान देंगे. कठोर रवैये से किसी देश का भला नहीं होगा. इसलिए दोनों देशों को गंभीर रुख अपनाना चाहिए.
पाकिस्तान द्वारा पांच फरवरी को आधिकारिक रूप से मनाये गये कश्मीर एकता दिवस का माहौल इस बार काफी उत्साहपूर्ण था. इसका प्रमुख कारण पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से सत्ता का हस्तांतरण नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुसलिम लीग को होना हो सकता है.
ऐसा नहीं है कि पीपुल्स पार्टी की सरकार कश्मीर मुद्दे पर कोई विपरीत रुख रखती थी, लेकिन देश के भीतर सुरक्षा चुनौतियों के भारी दबाव के कारण उसके पास पाकिस्तान के लिए बुनियादी तौर पर बहुत महत्वपूर्ण इस मुद्दे पर बहुत ध्यान देने की गुंजाइश कम थी.
अपनी नयी कश्मीर ‘रणनीति’ में दिखाने-भर के लिए कट्टर तबकों को साथ लेने के अलावा नवाज शरीफ भी बीते वर्ष मई में सत्ता संभालने के बाद से संभल कर चल रहे हैं. अपने चुनाव-प्रचार और प्रधानमंत्री के रूप में शुरुआती भाषणों में वे भारत के प्रति युद्धोन्मादी तेवर नहीं दिखा रहे थे. वे 1999 की लाहौर घोषणा का उल्लेख कर रहे थे, जिसे उन्होंने और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शांति-प्रक्रिया को आगे ले जाने के इरादे से तैयार किया था.
उन्होंने कभी कश्मीर नीति पर स्पष्टता नहीं दिखायी, पर भारत के साथ शांतिपूर्वक हर समस्या को हल करने का राग अलापते रहे. परंतु, उन्होंने किसी कट्टरवादी का भी विरोध नहीं किया था. चूंकि नवाज शरीफ सत्ता में आने के लिए एक हद तक चरमपंथियों के अहसानमंद हैं, इसलिए वे कभी-कभार, खास कर तब जब वे पाक अधिकृत कश्मीर में होते हैं, कश्मीर पर बोलते हैं, लेकिन आमतौर पर उनकी कश्मीर नीति परदे में ही रहती है.
मुजफ्फराबाद में कश्मीर काउंसिल की बैठक में कश्मीर समस्या का हल न होने की स्थिति में चौथे युद्ध की धमकी का बयान जब उनके नाम से उद्धृत किया गया, तो उनके कार्यालय ने न सिर्फ इसका खंडन किया, बल्कि इस बात को बाहर ‘जाहिर’ करने के आरोप में तीन अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया. कश्मीर पर बात करने का जिम्मा नवाज ने अपने विदेश नीति सलाहकार सरताज अजीज और कुछ अन्य लोगों पर छोड़ दिया है. जरूरी मसलों पर भी वे सीधे-सीधे कश्मीर पर कुछ कहने से बचते हैं.
ऐसे में पांच फरवरी जैसे अवसरों पर आधिकारिक भरोसे की बहाली की कोशिश पाक के कश्मीर-समर्थकों और अलगाववादियों को संतुष्ट रखने से अधिक कुछ नहीं है. इस तथ्य से इनकार नहीं किया सकता है कि कश्मीर विवाद में पाकिस्तान एक मुख्य साझेदार है और इस बाबत किसी भी फैसले में उसकी अनदेखी तो दूर की बात है, उसका शामिल होना अवश्यंभावी है. परंतु पाक बीते 65 सालों से कश्मीर के प्रति जो रवैया अपनाता रहा है, उसमें अनेक कमियां और पीछे हटने के उदाहरण हैं.
कश्मीर एकता दिवस का हवाला देते हुए पाक के प्रमुख अंगरेजी दैनिक ‘डॉन’ ने अपने संपादकीय (सात फरवरी) में लिखा है कि देश की कश्मीर नीति पर सुरक्षा-तंत्र हावी रहा है. अखबार ने कड़े शब्दों ने लिखा कि भले ही कश्मीर दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन कुछ ही लोग यह समझते हैं कि पाकिस्तान द्वारा राज्येत्तर ताकतों को बनाने-बढ़ाने से कश्मीर की स्वतंत्रता के मुद्दे को बहुत नुकसान पहुंचा है.
सही है कि कुछ राजनीतिक सरकारों ने ऐसी नीतियों के खतरों को समझा था, लेकिन सेना के जबर्दस्त विरोध के कारण वे कुछ नहीं कर सके. आमतौर पर इसलामाबाद कहता रहा है कि पाकिस्तान कश्मीर को सिर्फ कूटनीतिक, नैतिक और राजनीतिक समर्थन देता है, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक थी. 1989 में भारतीय शासन के खिलाफ कश्मीर में हुए विद्रोह में पाकिस्तान ने मदद तो की थी, लेकिन कुल मिला कर वह एक स्थानीय विद्रोह था. धीरे-धीरे पाकिस्तान ने रंग बदला और बाहरी तत्वों को आंदोलन में घुसाने लगा, जिसके कारण आंदोलन भी उसके कब्जे में चला गया और आंदोलन के तर्क भी बदल गये.
अलगाववादी खेमे की राजनीतिक समझ की चाबी पाकिस्तान के पास है और उसने कश्मीर में स्वतंत्र सोच को प्रोत्साहित नहीं किया है. हालांकि कश्मीर का अकेला खैरख्वाह होने का वह दावा करता है, लेकिन कश्मीरी समझ के लिए जगह और कश्मीर को सही पक्ष के रूप में स्थापित करने में वह बुरी तरह असफल रहा है. अगर पाकिस्तान की नीति सिर्फ कश्मीर ‘मुद्दे’ के हल में मदद करने की होती, तो उसे 1947 में कबायली हमले का ‘बोझ’ नहीं पड़ता, ‘दबाव में’ शिमला समझौते को नहीं मानना पड़ता, और न तो कश्मीर में उग्रवाद पैदा करना पड़ता और न ही अब उसे प्रचलित पाकिस्तानी मुहावरे ‘कश्मीर की थकान’ के कारण छोड़ देना पड़ता.
कश्मीर का सबसे अधिक नुकसान 11 सितंबर के हमले के बाद हुआ, जब इसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क के साथ जोड़ दिया गया और कश्मीर के वास्तविक राजनीतिक विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया गया. इसके लिए अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सक्रिय ताकतों से जुड़े तत्वों की भागीदारी भी जिम्मेवार थी. कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान बहुत कमजोर पड़ गया था और वह भारत के आरोपों को नहीं झेल सका.
यह भी सच है कि नवाज शरीफ को नयी दिल्ली से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली, फिर भी इसलामाबाद की ओर से वाणिज्य-व्यापार द्वारा द्विपक्षीय संबंध सुधारने की कोशिशें जारी रहीं और गैर-राजनीतिक संबंधों की बेहतरी में रुचि दिखायी गयी. आज दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से व्यापार एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और इस कारण इन्होंने नियंत्रण-रेखा से हो रहे व्यापार को भी छोड़ दिया है, जो कश्मीर की दृष्टि से भरोसे का माहौल बनाने की दिशा में अहम पहल था.
पाकिस्तान भले ही धूमधाम से कश्मीर एकता दिवस मना ले, लेकिन सच यह है कि उसकी कश्मीर थकन उसके असली व्यवहार में साफ दिख रही है. विशेषज्ञ और सरकार के कुछ महत्वपूर्ण लोग भी निजी बातचीत में मानते हैं कि पिछले एक दशक से अधिक समय से आतंक को लेकर पाकिस्तान को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है और कश्मीर इसका एक कारण है.
आज पाकिस्तान की भयावह आंतरिक स्थिति से हमें सहानुभूति हो सकती है, लेकिन इसके लिए कश्मीर नहीं, रक्षा-तंत्र के आगे झुकने की दोषपूर्ण नीति जिम्मेवार है, जिसकी तरफ ‘डॉन’ ने संकेत किया है. कश्मीर से संबंधित कई सवालों के जवाब पाक को देने हैं, लेकिन हमारी चिंता पाकिस्तान की स्थिरता पर केंद्रित रहनी चाहिए.
केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में अमन के लिए भारत और पाकिस्तान को कश्मीर समस्या के समाधान के बहुत जरूरी काम को हाथ में लेना होगा. उम्मीद है कि दिल्ली में नयी सरकार आने के बाद दोनों देश न सिर्फ कश्मीर मसले को सुलझाने के बड़े लक्ष्य की ओर अग्रसर होंगे, बल्कि अन्य समस्याओं पर भी ध्यान देंगे. कठोर रवैये से किसी देश का भला नहीं होगा. इसलिए दोनों देशों को अपनी-अपनी कश्मीर नीति पर पुनर्विचार कर गंभीर रुख अपनाना चाहिए.
