नौकरशाही की लालफीताशाही से चूजे मुरगों में बदल जाते हैं, फिर उनके पेट पालने की मजबूरी सरकार के सामने है. कमोबेश हर योजना का हश्र कुछ ऐसा ही होता है. एक बानगी देखिए, केंद्र प्रायोजित जीविका योजना के लिए राज्य की पोल्ट्री ने किसानों के बीच मुफ्त में बांटने के लिए चूजे मंगवाये. योजना यह है कि किसानों को मुफ्त में चूजे दिये जायेंगे.
ये चूजे देसी नस्ल के हैं, जो जूठन खाकर भी तेजी से बढ़ते हैं. इनसे किसानों को आय के साथ उनके पूरे परिवार का सेहत भी बुलंद होगी. तय कार्यक्रम के तहत ये चूजे पटना के पोल्ट्री में पहुंच गये. लेकिन किसानों के बीच इन्हें बांटने का कार्यक्रम ही तय नहीं हो पाया. दिन बीते, तो चूजे बड़े हो गये. अब इन मुरगा-मुरगियों को खिलाने में रोजाना हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं. इनका अब क्या किया जाये, कोई बताने को तैयार नहीं है. यह उदाहरण यह समझने के लिए कापी है कि बेहतर योजनाएं क्रियान्वयन के मौके पर इसी तरह दम तोड़ देती हैं.
गरीबों को लाभ तो नहीं होता है और उनके नाम पर लूट जारी रहती है. अभी हाल में चीन के आर्थिक विकास खासकर वहां के गांवों के विकास की कहानी पर जारी अध्ययन में यह कहा गया है कि योजनाओं के सही तरीके से लागू करने के कारण यह सफलता हासिल हुई है. बिहार-झारखंड में ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि योजनाओं को सफल तरीके से लागू करने पर अच्छे नतीजे हासिल होते हैं. सरकार और अधिकारियों के प्रति आस्था का भाव पैदा होता है. दोनों राज्य नक्सली हिंसा से जूझ रहे हैं. हिंसा को खत्म करने के नाम पर दर्जनों कल्याणकारी योजनाएं चल रही हैं, जिनका लाभ गरीबों को नहीं मिलता.
ऐसे में सरकार व व्यवस्था के खिलाफ अनास्था का भाव गहन होता जाता है. सरकार जितनी मुस्तैदी से कल्याणकारी योजनाओं का प्रचार करती है, उतनी ही मुस्तैदी से उनका क्रियान्वयन करें, तो स्थितियां बदलने में देर नहीं लगेंगी. अभी स्थितियां यह है कि ज्यादार योजनाएं की सप्लाई चूजे की तरह कर दी जाती हैं. फिर ये योजनाएं समय बीतने के साथ मुरगा में बदल जाते हैं और जिनके कल्याण के लिए ये योजनाएं बनी हैं, उनका हिस्सा खाकर ये मुरगा मोटाते रहते हैं. इस स्थिति को बदलने की जरूरत है. अफसरशाही व लालफीताशाही को खत्म करने का मात्र जाप करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है. जरूरत इमानदार प्रयास का, जिससे सूरत बदलें.
