उत्तर बिहार में माओवादी गतिविधियों से जुड़ी दो खबरें गौर करने लायक हैं. गंडक नदी पर गोपालगंज और मुजफ्फरपुर को जोड़ने वाले जिस मेगा पुल का शिलान्यास मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था, उसकी निर्माण एजेंसी से नक्सलियों ने पांच फीसदी लेवी मांगी है. दूसरी खबर यह है कि माओवादियों को लेवी देने जा रहे एक भाजपा विधायक के मैनेजर को पुलिस ने गिरफ्तार किया. दोनों घटनाओं का भले आपस में कोई संबंध नहीं हो, लेकिन ये संकेत दे रही हैं कि माओवादियों का न केवल दुस्साहस बढ़ा है, बल्कि रसूखदार लोगों ने उनसे समझौता भी कर रखा है.
सड़क, पुल या बांध निर्माण की सरकारी परियोजनाओं से माओवादियों द्वारा लेवी वसूलने के मामले पहले भी सामने आये हैं. लेवी न देने पर निर्माण कंपनियों को माओवादियों का कोपभाजन बनना पड़ता है.
खास तौर पर गया, औरंगाबाद, गोपालगंज, सीतामढ़ी और शिवहर में हाल के दिनों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं. पहले माओवादी गतिविधियां दक्षिण या पूर्वी बिहार तक सीमित थीं, क्योकि ऐसे इलाकों की भौगोलिक बनावट (जंगल, पहाड़ आदि) उनके लिए माकूल थीं. लेकिन, उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में उनकी पैठ बढ़ना सचमुच चिंता की बात है. राज्य में इन दिनों सड़क और पुल-पुलिया निर्माण की कई परियोजनाओं पर काम चल रहा है. यदि माओवादी इसी तरह बेखौफ रहेंगे, तो विकास कार्य प्रभावित होगा ही, लेवी वसूल कर वे अपना आर्थिक आधार भी सुदृढ़ करते रहेंगे. फलस्वरूप उनकी गतिविधियां और बढ़ेंगी. फिर नामी-गिरामी निर्माण एजेंसियां बिहार में काम करने से कन्नी काटेंगी.
यदि विकास कार्यो को अनवरत जारी रखना है और समय सीमा के भीतर इसे जमीन पर उतारना है, तो माओवादियों से सख्ती से निबटना ही होगा. लेकिन, यह भी सही है कि सिर्फ पुलिस-प्रशासन के स्तर से यह काम नहीं हो सकता है. यह कैसे संभव है कि माओवादी हिंसा पर हम-आप स्यापा करें और उनके खौफ के आगे झुक कर सुविधाजनक रास्ता भी अख्तियार कर लें. माओवादियों की सबसे बड़ी ताकत जनता के बीच उनकी पैठ है. उन्हें अलगाव में डालने की चुनौती स्वीकार करनी होगी, न कि उनके खौफ के आगे झुक कर खुद को सुरिक्षत रखने का उपाय ढूंढ़ना होगा.
