संसद में हंगामे के बीच यह जरूर देखा जाना चाहिए कि किसी बिल का विरोध क्यों किया रहा है. इससे पीछे मकसद ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करने’ का है या ‘कोशिश सूरत बदलने’ की हो रही है. अफसोस कि 15वीं लोकसभा के आखिरी सत्र की कार्यवाहियों में सूरत बदलने की कोशिश कम ही दिखायी दे रही है. आशंका के मुताबिक सांप्रदायिक हिंसा निरोधी बिल भाजपा सहित कई दलों के भारी विरोध के कारण राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सका.
विरोध करनेवालों का आरोप है कि कानून-व्यवस्था का मामला राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में आता है, जबकि यह बिल दंगा रोकने और उससे जुड़ी न्याय-प्रक्रिया के मामले में एक सीमा तक केंद्र की शक्तियों को राज्यों पर तरजीह देता है. विपक्षी दलों की यह आशंका निराधार नहीं है. यह बिल अपने अस्तित्व के विविध अवतारों में करीब दस साल गुजार कर भी पारित नहीं हो सका है, क्योंकि बार-बार संशोधन के बावजूद इसका सर्वसम्मत मसौदा तैयार नहीं हो सका है. इस बिल की सुगबुगाहट गुजरात-दंगे के बाद से शुरू हुई थी और 2005 के दिसंबर महीने में पहली बार इसे लोकसभा में पेश किया गया था.
तब से इसे बार-बार सुधार के लिए वापस लिया जाता रहा है. बीते दिसंबर में संशोधित बिल को फिर कैबिनेट ने मंजूरी दी थी. उस समय भी इस पर सवाल उठे थे, क्योंकि इसमें दंगे के आरोपी विविध संप्रदायों के लोगों के लिए अलग-अलग अदालत की व्यवस्था थी. संप्रदाय की परिभाषा को लेकर भी पर्याप्त आशंकाएं थीं. साथ ही बिल के संघीय भावना के प्रतिकूल होने की तरफ भी इशारा किया गया था. बहरहाल, बिल में हजार कमियां हों, पर एक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में दंगों का होना जारी है और दंगा पीड़ितों को समय पर समुचित न्याय न मिलने की बात सामने आती है.
इसके लिए सिर्फ मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़ी खबरों को याद कर लेना काफी होगा. ऐसे में क्या विपक्ष की जिम्मेवारी यह नहीं बनती कि सांप्रदायिक हिंसा को एक ज्वलंत समस्या मानते हुए इसके रोकथाम और इससे जुड़ी न्याय-व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कोई सकारात्मक कार्यक्रम पेश करें? लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का सकारात्मक नजरिया जरूरी है. इसलिए बहसतलब तमाम बिलों पर विपक्ष से सकारात्मक पहल की उम्मीद है.
