देश की मौजूदा राजनीति की विडंबनाओं में एक यह भी है कि कांग्रेस और भाजपा से इतर एक तीसरे विकल्प की जमीन लगातार बढ़ती गयी है, पर उस जमीन पर कोई राजनीतिक विकल्प कारगर और भरोसेमंद ढंग से खड़ा नहीं हो पाया है.यह जमीन इसलिए बढ़ी है, क्योंकि कांग्रेस व भाजपा के इर्द–गिर्द चलनेवाली भारतीय राजनीति अपने विकासवादी जुमले में लगातार शहरी और मध्यवर्गीय हितों–आकांक्षाओं की पोषक बनती गयी है, जबकि ग्रामीण खेतिहर अर्थव्यवस्था से जुड़े एक बड़े समाज की इच्छा–आकांक्षा यह राजनीति अभिव्यक्त नहीं कर पा रही.
लिहाजा, तीसरे धारे की राजनीति भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से की इच्छा-आकांक्षा का प्रतिनिधित्व कर सकती है. लेकिन केंद्रीय राजनीति में बरसों से ऐसा होता नहीं दिखा. चुनाव से ऐन पहले तीसरे धारे की राजनीति खड़ा करने की कोशिशें पहले भी हुई हैं. इस बार भी चारों वामपंथी दलों सहित कुल 11 दलों ने आम चुनाव से पहले एक साझा मोरचा बनाने की पहल की है.
इसे फौरी जरूरत के मद्देनजर की गयी पहल कह कर नकारा नहीं जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी जीवंत लोकतंत्र में आम चुनाव का वक्त देश के राजनीतिक भविष्य और रीति-नीति को दशा-दिशा देने के लिहाज से निर्णायक होता है और इसी कारण चुनाव के वक्त स्थापित राजनीति से इतर वैकल्पिक राजनीति की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस की जाती है.
लेकिन तीसरा मोरचा खड़ा करने की किसी भी ईमानदार कोशिश को अपनी मजबूती और कमजोरी का आकलन करना जरूरी होगा. देश में तकरीबन आधी लोकसभाई सीटें उन राज्यों में हैं, जहां फिलहाल गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा दलों का शासन है. यह तथ्य तीसरे मोरचे की राजनीति का सर्वाधिक मजबूत पक्ष है. लेकिन, तीसरे मोरचे के भीतर नेतृत्व का ढांचा खड़ा करने, बदले माहौल के अनुकूल राजनीतिक सोच गढ़ने और एक ऐसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करने की कठिन चुनौती है, जो सचमुच उसे स्थापित राजनीति का विकल्प बनाता हो.
इसके लिए अतीत में की गयी ऐसी पहलकदमियों से सीख लेने की भी जरूरत है, ताकि यह न लगे कि फिर से किसी पुरानी बातों को दोहराया जा रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि तीसरा मोरचा इस चुनौती का सामना किस प्रकार करता है.
