भारतीय रिजर्व बैंक को देश के तमाम वाणिज्यिक बैंकों की निगरानी-संस्था कहा जाता है. बैंकों की नियमित गतिविधियों पर नजर रखने के साथ-साथ बैंक रेट, रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट निर्धारित करने की अहम जिम्मेवारी रिजर्व बैंक की ही है और वह देश के आर्थिक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर वाणिज्यिक बैंकों को अपना दिशा-निर्देश जारी करते रहता है.
बीते दिनों करेंसी नोटों पर अपनी गाइडलाइन में रिजर्व बैंक ने कहा है कि आनेवाले दिनों में उन सभी नोटों के प्रचलन पर रोक लगायी जायेगी, जो वर्ष 2005 से पहले छपे हैं.
रिजर्व बैंक द्वारा यह अप्रत्याशित कदम उठाये जाने के पीछे शायद कोई ठोस तर्क हो! संभव है कि इससे काले धन का प्रवाह रुके, जाली नोटों के कारोबार पर पूर्ण रूप से अंकुश लगे और देश की अर्थव्यस्था को मजबूती मिले! लेकिन बड़ा सवाल यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा निर्गत यह आदेश क्या सिर्फ जनता के लिए है? क्या वाणिज्यिक बैंकों को भी इस संबंध में कोई आदेश अथवा गाइडलाइन दिये गये हैं? यदि हां, तो फिर बैंक अपने एटीएम में 2005 से पहले के करेंसी नोट क्यों भरे जा रहे हैं?
वाणिज्यिक बैंक के काउंटरों से लोगों को आज भी 2005 से पहले के करेंसी नोट क्यों दिये कराये जा रहे हैं? वाकई इस पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि रिजर्व बैंक द्वारा तय 31 मार्च की समय सीमा में महज दो महीने शेष हैं और रिजर्व बैंक यदि अभी से ही वाणिज्यिक बैंकों पर सख्ती नहीं बरतता है तो जाहिर है कि ये अपने ग्राहकों से पुराने नोटों का लेन-देन यूं ही करते रहेंगे और अंतत: आम जनता को ही नुकसान उठाना. लिहाजा, रिजर्व बैंक से गुजारिश है कि इस संबंध में तमाम वित्तीय उपक्र मों को स्पष्ट दिशानिर्देश दे, ताकि जनता आपाधापी से बचे
रवींद्र पाठक, जमशेदपुर
