वर्ष 2005 से पहले छपे नोट खत्म करने का भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है. उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारी अर्थव्यवस्था की दो बड़ी बीमारियों- काले धन के प्रचलन और नकली नोटों के प्रसार पर इससे रोक लग सकेगी. काला धन तो हमारे देश के लिए एक सियासी मुद्दा बन गया है. कभी विदेशों में जमा काले धन को वापस लाये जाने की मांग होती है, तो कभी पचास से ऊपर के सारे नोट बंद कर दिये जाने की.
लेकिन इन मांगों को अमल में लाना व्यावहारिक रूप से उतना ही कठिन है. पहले जब यह मसला सामने आया था तो सरकार वॉलंटरी डिसक्लोजर स्कीम लायी थी. लेकिन उसका बहुत लाभ नहीं हुआ. पिछले कुछ सालों में पड़ोसी मुल्कों से बड़ी संख्या में नकली नोट भारत आने की खबरें आती रही हैं. कहा तो यहां तक जाता है कि आज प्रचलित नोटों में 10-15 फीसदी नकली हैं. इसलिए गहन चिंतन कर रिजर्व बैंक ने पुराने नोट समाप्त करने की यह योजना बनायी है. इसका एक मकसद प्रचलित नोटों में एकरूपता लाना भी है.
पुराने नोट खत्म करने का फैसला कोई पहली बार नहीं हुआ है. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स समाप्त करने का निर्णय किया था तो कुछ बड़े नोटों को रातोरात चलन से बाहर कर दिया गया था. तब लोगों में घबराहट फैल गयी थी. लेकिन इस बार रिजर्व बैंक ने लोगों को पर्याप्त समय देते हुए किसी भी बैंक में नोट बदलने की सुविधा दी है. रिजर्व बैंक को उम्मीद है कि इन उपायों से हवाला या नकदी से जुड़े दूसरे गोरखधंधों पर रोक लग सकेगी. गौरतलब है कि 2005 के बाद छपे नोट तकनीकी दृष्टि से पिछले नोटों से काफी बेहतर हैं, जिनकी नकल आसान नहीं है. आशा है कि यह योजना काले धन के कैंसर से निबटने में कारगर रहेगी.
अनिल सक्सेना, टेल्को, जमशेदपुर
