।। अनंत कृष्णन।।
नवंबर 2011 में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बागडोर संभालने के ठीक साल भर पहले क्सी जिनपिंग ने केंद्रीय पार्टी शिक्षणालय के छात्रों के समक्ष एक व्याख्यान दिया था. बीजिंग के वनाच्छादित पश्चिम उपनगरों में इस संस्थान में चीन के भावी नेता प्रशिक्षित किये जाते हैं. यह भाषण असाधारण रूप से साफगोई से भरा था और इसमें श्री क्सी ने चीनी नेताओं द्वारा बड़े जतन से पालन किये जानेवाले ढर्रे को तोड़ कर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को वास्तविकताओं से कट कर रहने के लिए फटकार सुनायी थी.
बड़े अचरज की बात यह थी कि श्री क्सी ने वर्तमान स्थिति की तुलना चीनी इतिहास के एक ऐसे अध्याय से की थी, जिसकी चर्चा आज चीन में बिरले ही कभी की जाती होगी. उन्होंने कहा, ‘‘1960 वाले दशक के आरंभिक वर्षो में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी बुनियादी स्तर पर सर्वेक्षण करके ‘एक कठिन स्थिति को पलटने में’ समर्थ हुई थी और उससे यह सिद्ध हुआ था कि जोरदार जांच-अध्ययनों का कितना अधिक महत्व होता है.’’
श्री क्सी उन उथल-पुथल भरे वर्षो का जिक्र कर रहे थे, जिनके साथ माओ-त्से-दोंग द्वारा 1958 में छेड़े गये उस ‘लंबी छलांग’ अभियान की समाप्ति हुई थी, जिसने चीन के देहाती इलाकों को सरासर तबाह कर छोड़ा था. तबाही के ये चार वर्ष चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शासन का सबसे काला अध्याय हैं. कहा जा सकता है कि संकट की भीषणता और व्यापकता की दृष्टि से यह तबाही एक दशक लंबी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ (1966-76) को भी मात करती है.
चुटकियों में चीन को औद्योगिक महाशक्ति बना कर रूस के मुकाबले खड़ा कर देने की माओ की भ्रांतिभरी कल्पना से प्रेरित किसानों से कहा गया कि खेती के औजारों को अलविदा कहो और अपने घरों के पिछवाड़े में भट्ठियां बना कर लोहा तैयार करो. खेत वीरान पड़े रहे. मगर अफसरान अध्यक्ष माओ को खुश करने के लिए भरपूर फसलें होने के झूठे आंकड़े ऊपर भेजते रहे. समूचा देश अकाल की गिरफ्त में आ गया. लाखों की संख्या में लोग दम तोड़ने लगे. मगर बीजिंग में ‘पीपल्स डेली’ असाधारण आर्थिक प्रगति की खबरें छापता रहा. चीन के बाहर और भीतर माओवादी उन खबरों को चाटते रहे. मगर वास्तविकता कुछ और ही थी, सो भी कल्पनातीत ढंग से.
भूख-पीड़ित किसान जब अपने परिवार का पेट भरने के लिए अनाज की तलाश में अपने गांव से बाहर निकलते, उन्हें गोली मार दी जाती. जिन अफसरों ने ‘लंबी छलांग’ अभियान की तर्कसंगतता पर संदेह उठाया, उनका सफाया कर दिया गया. तीन करोड़ से ज्यादा लोग भूख की बलि चढ़ गये. उस विनाश की विराटता और भीषणता को देखते हुए यह बात उल्लेखनीय है कि इस समय चीन में ऐसे लोग बिरले ही हैं, जिन्हें आज से पांच दशकों से भी कम समय पहले की उस अकाल-गाथा की खबर हो, जिसने तीन करोड़ इन्सानों की जान ले ली. पाठ्य-पुस्तकों में ‘प्राकृतिक विपदा के तीन वर्षो’ का अस्पष्ट-सा उल्लेख मिलता है, जबकि करोड़ों लोगों की मृत्यु के लिए माओ की जिम्मेवारी पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने परदा डाल रखा है और पार्टी अभी भी माओ को देवता बनाये हुए है. इस स्मृतिलोप से जूझना पिछले 25 वर्षो से यान जिरोंग के जीवन का मिशन बना हुआ है. 73 वर्षीय श्री यांग एक अनुभवी चीनी पत्रकार तथा लेखक हैं जो पिछले तीन दशकों से उस अकाल का सच्च ऐतिहासिक लेखा-जोखा तैयार कर रहे हैं. उनके इस शोध कार्य का परिणाम है 1,000 पृष्ठों का एक शोध-प्रबंध, जिसे तैयार करने में उन्हें अप्रत्याशित रूप से क ई पार्टी-कार्यकर्ताओं से सामग्री मिली है, जो उन्हीं की तरह उस दौर के झूठे सरकारी दस्तावेजों से क्षुब्ध हैं. यांग ने अपने पिता की स्मृति में इस शोध-प्रबंध का यह शीर्षक रखा है- ‘समाधि-लेख’. उनके पिता उनकी आंखों के सामने भूख से तड़पते हुए चल बसे थे. यांग तब 19 वर्ष के थे.
श्री यांग ने मुझसे कहा, ‘‘अफसर-वर्ग इतिहास के उस हिस्से से हमेशा ही मुंह फेरने की कोशिश करता आया है. मेरा अपना आकलन यह है कि तीन करोड़ 60 लाख आदमी (उस अकाल में) मर गये. यह अंदाजा कुछ घट कर ही है. कारण, कुछ बातें ठीक-ठीक निर्धारित नहीं की जा सकतीं.’’ उन्होंने बताया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के इतिहास के दूसरे खंड में भी यही कहा गया है कि 1958 से 1960 के बीच चीन की आबादी में ‘एक करोड़’ की कमी हुई, जब उस दौर में वह एक करोड़ बढ़नी चाहिए थी. मगर पार्टी अपने वृत्तांतों में आधिकारिक रूप से यही मानती है कि उन वर्षो में ‘प्राकृतिक विपदाओं’ के कारण एक करोड़ 60 लाख आदमी मरे.
उन वर्षो के अकाल के बारे में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की रिपोर्टो में जो चीज समान रूप से पायी जाती है वह है – व्यवस्था के दोष को कबूल करने से इनकार. अफसरों ने प्राकृतिक स्थिति को दोष दिया है या रूस पर दोष कर्ज वापसी की मांग करने के लिए मढ़ा है. तीन दशकों के सुधारवाद के बाद चीन माओवाद से मुंह मोड़ चुका है. फिर भी पार्टी इतिहास के इस अध्याय से मुंह फेर रही है. श्री यांग इसे पार्टी के लिए खतरनाक कहते हैं.
‘‘आज हम जन-कम्यून नहीं खड़े कर रहे हैं. आज हम ‘लंबी छलांग’ नहीं भर रहे हैं. उस समय भूख से मरते लोगों को खाने की तलाश में निकलने की अनुमति नहीं दी गयी थी, क्योंकि पार्टी का कहना था कि वैसा करना पूंजीवादी होना है. उस समय सर्वसत्तावादी व्यवस्था थी, इसी कारण माओ की गलत नीतियों पर चार बरसों तक अमल किया जाता रह सका. अगर चीन अमेरिका होता, या ब्रिटेन, या भारत तो उन गलत नीतियों का अवश्य विरोध हुआ होता.’’
उन वर्षो में मौत के मुंह में समा जाने वाले मां-बापों, बेटे-बेटियों के मुखड़े और किस्से आज भी श्री यांग का पीछा किये करते हैं. उनकी रिपोर्ट में चालीस-एक साल की एक औरत का फोटोग्राफ है, जो अभी-अभी मरे अपने बच्चे का शव चीर रही है, ताकि भूख से बेहाल अपने दूसरे बच्चों को उसका मांस परोस सके. अभी साल भर पहले श्री यांग की मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई थी, जिसके दो स्वजन उस अकाल में मरे थे. मगर उस आदमी का 19 वर्षीय पोता जिसे उन वर्षो के बारे में स्कूल में कुछ भी नहीं बताया गया, यह मानने को तैयार नहीं कि वे स्वजन भूख से मरे थे.
‘‘उस आदमी से उनके पोते ने कहा कि अगर लोग भूखे थे तो वे कोई फसल उगा सकते थे. हमें इतिहास के उस हिस्से से आमना-सामना करना पड़ेगा, ताकि उससे सबक ले सकें और आगे वैसी गलतियों से बच सकें. यह सुनने के बाद, वह सब कुछ मेरे लिए बदल गया जो मैं समझता था कि राजनैतिक व्यवस्थाओं और समस्याओं के सुलझाने के तरीकों के बारे में, सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण के बारे में मैं जानता हूं. अगर हम इतिहास के इस हिस्से के बारे में लोगों को बतायेंगे नहीं तो अगली पीढ़ियां इस बारे में कभी न जान पायेंगी. इतिहास तब मिथक बन कर रह जायेगा.’’
नये नेताओं के सामने नयी चुनौतियां
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एक अधिकारी ने मुझसे कहा कि पिछले चार दशकों में उनके देश के राजनैतिक परिदृश्य में हुए परिवर्तन का सबसे बढ़िया उदाहरण है दो व्यक्तियों की परस्पर विरोधी कथाएं. वे व्यक्ति थे – लिन बियाओ और वांग लीजुन. सितंबर 1971 में तख्तापलट की कोशिश की जोरदार अफवाहों के बीच एक चीनी वायुयान मंगोलियाई रेगिस्तान में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. उस पर लिन बियाओ सवार थे, जो कि तब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे नामी क्रांतिकारों सेनानियों में से एक थे और एक समय माओ-त्से-दोंग के सबसे करीबी दायें हाथों में गिने जाते थे. तख्तापलट की वह अफवाह आज भी चीन के इतिहास का एक रहस्य बनी हुई है और उसका जिक्र आज भी ‘लिन बियाओ घटना’ कह कर सांकेतिक रूप से ही किया जाता है.
उस अधिकारी ने बताया, ‘‘यह बात कि चीन के सबसे प्रसिद्ध राजनैतिक नेताओं में से एक उस विमान दुर्घटना में चल बसा है, सिर्फ दो व्यक्ति जानते थे- झाओ एनलाई (तत्कालीन प्रधानमंत्री) और अध्यक्ष माओ-त्से-दोंग. पार्टी के तमाम अधिकारियों को यह बात महीने भर बाद बतायी गयी. और जनता? वह तो दो महीने बाद ही उसे जान पायी.’’
ठीक चार दशक बाद, जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के उच्चतम नेता अस्थिरता उत्पन्न करनेवाले एक राजनैतिक कांड से निबट रहे थे तो उन्होंने पाया कि उस कांड पर परदापोशी करने के लिए उनके पास कोई परदे जैसी चीज ही नहीं. 6 फरवरी 2012 को दक्षिण-पश्चिमी चीन के चौंग-किंग नगर के पुलिस प्रमुख वांग लीजुन ने भाग कर नजदीक के शहर चेंगदू के अमेरिकी उपदूतावास में जाकर पनाह मांगी. बात यह थी कि अपने पुराने आका, पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य और पार्टी के ‘उपराजकुमारों’ में गिने जानेवाले बो क्सीलाई से उसकी अनबन हो गयी थी. बीजिंग में पार्टी मुख्यालय अभी सोच ही रहा था कि अपने एक आंतरिक अपवाद का भांड़ा अपने सबसे प्रबल प्रतिस्पर्धी देश अमेरिका के दूतावास में फूटने के इस ङोंपानेवाले प्रकरण पर वह क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करे, तब तक अमेरिकी दूतावास की घेराबंदी करने के लिए चीनी पुलिस की मोटरगाड़ियों का काफिला रवाना होने की तसवीरें लाखों चीनी माइक्रोब्लागर एक दूसरे की मदद से देख चुके थे.
अगले सप्ताहों में यह ‘वांग लीजुन घटना’ खुल कर जनता के सामने आयी और सार्वजनिक रूप से प्रकट होनेवाली पहली चीनी राजनैतिक कलंक-कथा बन गयी. इस दौर में कई बार ऐसा लगा कि चीनी अधिकारी यह सोच नहीं पा रहे हैं कि इससे निबटा कैसे जाये. बो क्सीलाई और उसके परिवारवालों के हथकंडों के विवरण माइक्रोब्लागों की मदद से लोगों तक पहुंचने से फैली अफवाहों पर चीन के सरकारी प्रसार-माध्यम पहले तो चुप्पी साधे रहे. जब लीजुन के अमेरिकी उपदूतावास में शरण लेने के महीने भर बाद उसके आका बो क्सीलाई को पदच्युत किया गया तब असंभव जान पड़नेवाली तमाम अफवाहों की मानो पुष्टि हो गयी.
श्री क्याओ मू बीजिंग विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्राध्यापक हैं और राजनैतिक सुधारों के बड़े स्पष्टवादी समर्थक हैं. चीन के सूचना परिदृश्य में हो रहे नाटकीय परिवर्तनों को वे चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीति के लिए गेमचेंजर मानते हैं. उनका कहना है, ‘‘आज हम प्रतिदिन इतने सारे चीनियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बातचीत करते सुनते हैं! जो चीज लगातार बढ़ती हुई नजर आ रही है वह है जिम्मेवार नागरिक बनने के प्रति जागरूकता, अधिकारों के प्रति जागरूकता. आत्माभिव्यक्ति के अधिकार के प्रति, जानने के अधिकार के प्रति, जानकार बनने के अधिकार के प्रति जागरूकता- प्रतिदिन मात्र सीसीटीवी देखने के प्रति नहीं’’, उनका इशारा सनसनी-हीन गंभीर चीनी केंद्रीय टीवी की ओर था.
ट्विटर का चीनी समकक्ष सिना वाइबो बहुत ही लोकप्रिय है. लगभग 50 करोड़ चीनी उसका उपयोग कर रहे हैं और अनेक बंदिशों के बावजूद वह विचारों के आदान-प्रदान का दमदार जरिया बन गया है. ‘‘रेडियो और टेलीविजन पर अब भी चीनी सरकार का नियंत्रण है. मगर इंटरनेट पर नियंत्रण रख पाना सरकार के लिए दुश्वार हो रहा है, क्योंकि रोज नयी टेक्नोलॉजी निकल आती है’’, उन्होंने कहा. फिर भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी साइबर स्पेस से निबटने में अभी तक कामयाब ही रही है. इसके लिए उसने व्यापक व्यवस्था कर रखी है, जिसे अक्सर लोग ‘चीन की महान अग्नि-दीवार (फायरवॉल)’ कहा करते हैं. बो क्सीलाई कांड ने यह भी दिखा दिया कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी, उसी के शब्दों में कहें तो ‘जनमत का मार्गदर्शन’ सोशल मीडिया के जरिये करने में कामयाब रही है. इसके लिए कभी तो चुनिंदा खबरें ‘लीक’ करती है, कभी प्रमुख ‘जनमत-निर्माताओं’ को आगे बढ़ाती है.
मगर श्री क्याओ चीन में उभर रहे ‘इंटरनेट नागरिक समाज’ को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मार्क्स ने एक बार कहा था कि दुनिया के श्रमजीवी एकजुट हो गये हैं. आज सारी दुनिया के ‘नेटिजन’ (इंटरनेट सिटिजन) एकजुट हो गये हैं.’’श्री क्याओ बीजिंग के उन विद्वानों, पत्रकारों और क्रियाशील नागरिकों में से हैं, जिन्होंने 2011 में ‘वैयक्तिक उम्मीदवार’ की हैसियत से स्थानीय निकायों के चुनाव लड़े थे. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी प्रशासन के सबसे निचले स्तर पर ही चुनाव होने देती है. स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने के इस प्रयास में श्री क्यांग तथा अन्य स्वतंत्र उम्मीदवारों की सबसे अधिक सहायता साइबर स्पेस ने की थी.
श्री क्यांग का कहना है, ‘‘हो सकता है, चीनी सरकार बहुत धीमी रफ्तार से बदलती हो. लेकिन अब ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं जो इस बात को समझने लगे हैं कि हमारे बुनियादी अधिकार क्या हैं? हम अपनी आवाज सुनना चाहते हैं. हम नहीं चाहते कि हमारी ओर से दूसरे लोग बोलें. हो सकता है, आज से दस बरस पहले, जब वाइबो नहीं था, अपने मतदाताओं को लामबंद करना, अपने विचार उन तक पहुंचाना असंभव हो रहा हो.’’ आज यह स्थिति नहीं है.
अपने विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार श्री क्याओ उस ढंग से प्रचार कर सके जिस ढंग से चुनावों में उम्मीदवार किया करते हैं. उन्होंने विद्यार्थी स्वयंसेवक जमा किये. वे स्वयं छात्रवासों में एक-एक कमरे में गये, पोस्टर चिपकाये. शीघ्र ही अधिकारियों ने उनके काम में दखल दिया. शायद अधिकारी घबरा गये थे कि इस अभियान का न जाने क्या परिणाम हो. अंतत: क्याओ चुनाव हार गये.
मगर उनका कहना है, ‘‘यह इसका अच्छा उदाहरण था कि बहुत कुछ बदला जा सकता है.’’ अधिकाधिक जागरूक होते हुए नागरिकों की आशा-आकांक्षाओं से निबट पाना शायद आगामी वर्षो में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन जायेगी.
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नये कर्णधार क्सी जिनपिंग ने अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल की शुरुआत पिछले साल बहुप्रचारित भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान के साथ किया था, जिसका उद्देश्य था व्यापक घूसखोरी के विरुद्ध बढ़ने जन-विक्षोभ को शांत करना. अपने दस वर्ष के कार्यकाल में उनका कार्यालय जनता की मांगों को पूर्ण करने में भले ही कितना भी सफल रहे, लेकिन जनता की आकांक्षाओं के उभरने का अर्थ यह है कि आगामी वर्षो में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकारियों का काम लगातार कठिन होता जायेगा.
श्री क्यांग का कहना है, ‘‘भले ही हमारा अभियान (यानी स्वतंत्र उम्मीदवारों का चुनावों में खड़ा होना) रोक दिया गया हो, लेकिन आज से पांच साल या दस साल बाद क्या होगा? सोशल मीडिया का उपयोग करनेवालों की तादाद बढ़ती जा रही है सो भी युवा पीढ़ी में, और अधिकारों के प्रति सजगता बढ़ती जा रही है. चीन की बहुत-सी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की जड़ें उसकी राजनीति में हैं. उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार की समस्या. पार्टी की अपनी अनुशासनात्मक नीति है. फिर भी हर साल, हर दिन भ्रष्टाचार के इतने सारे मामले सामने आते रहते हैं! हर चीज अंतत: राजनीति में पहुंचती है.’’ कम से कम इस एक बात में, माओ के दिनों में जो स्थिति थी वही श्री क्सी के दिनों में भी है.
अनुवाद : नारायण दत्त (साभार : द हिंदू)
