बिहार में उच्च शिक्षा पर लगातार उठते सवालों के बीच एक अच्छी खबर आयी. दस विश्वविद्यालयों में कुलपति और नौ में प्रति कुलपति की नियुक्ति हुई है. ये सभी शिक्षा के क्षेत्र से हैं. खास बात यह है कि सबकी अच्छी साख है. इनमे से कोई भी तिकड़मी और राजनीति जुगाड़ से कुलपति बना हो, ऐसा पहली नजर में नहीं दिखता.
संभव है कि थोड़ा बहुत किसी का किसी राजनेता से संबंध हो, इसके बावजूद नियुक्ति पूरी तरह से काबिलीयत के आधार पर दिख रही है. यह प्रदेश की उच्च शिक्षा के लिए शुभ संकेत है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही कह चुके हैं कि उच्च शिक्षा में बड़ा बदलाव होना चाहिए. कुलपतियों की सूची देख कर लगता है कि सरकार सिर्फ बात नहीं कर रही, वह उसे हकीकत में बदलने को तत्पर है. कुलपति नियुक्ति की प्रक्रि या शुरू होते ही यह चर्चा शुरू हो गयी थी कि सर्च कमेटी बस दिखावा है, नाम तो पहले से तय हैं.
ऐसी आवाजें उठना भी लाजिमी है, क्योंकि बिहार का पुराना रिकॉर्ड तो यही कहता है. पिछले दो दशक में कुलपति नियुक्ति विवादों में रही. एक तरह से इस पद के लिए बोली लगती रही है. पिछले दिनों हालात यहां तक पहुंचे कि हाइकोर्ट ने कुलपति नियुक्ति को रद्द कर दिया था. बहरहाल, इस बार पारदर्शी नियुक्ति के लिए सरकार और उससे भी ऊपर सर्च कमेटी को बधाई देनी होगी. कमेटी ने बोरे में भर-भर कर आये आवेदनों में से बेहतर चुनाव किया. लेकिन, यह भी सच है कि असली चुनौती अब शुरू होगी. जरूरत होगी पूरी व्यवस्था बदलने की. नये कुलपतियों को शिक्षाविद् होने के साथ-साथ कठोर प्रशासक की भूमिका भी निभानी होगी. सभी विश्वविद्यालय भवन, शिक्षक और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं.
उससे भी अधिक ये विश्वविद्यालय अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं. एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के 40 फीसदी शिक्षक अपने दफ्तरों से लगातार गैरहाजिर रहते हैं. देश की तमाम बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां ये मानती हैं कि बिहार से डिग्री लेनेवाला युवक काबिल नहीं होगा. कुलपतियों को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्यों देश की नामी कंपनियां हमारे यहां प्लेसमेंट के लिए नहीं आतीं. जरूरत है शिक्षा में सुधार और अनुकूल माहौल की, ताकि डिग्री लेकर निकली पीढ़ी काबिल हो.
