संविधान, कानून, नागरिकों के मौलिक अधिकार तथा पंचायतीराज व्यवस्था जैसी कितनी ही आकर्षक और मजबूत व्यवस्थाओं के होते हुए भी देश की आधी आबादी आज भी अपने अस्तित्व, अधिकारों और सम्मान की बात करने पर प्रताड़ित की जा रही है.
अपने प्रत्येक गणतंत्र दिवस पर शक्ति-प्रदर्शन करनेवाले भारत देश में, नारी पूजा का दंभ भरनेवाले इस महान देश में आज भी स्त्रियों के खिलाफ कुकृत्य- अन्याय, अत्याचार, व्यभिचार सीना ठोंक कर किये जा रहे हैं.
इज्जत के नाम पर कत्ल, डायन घोषित करना, चाल-चलन, पोशाक व आचरण पर अभद्र टीका-टिप्प्णी करना, गांव भर में नग्नावस्था में घुमाना, रीति-रिवाजों के नाम पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाना और प्रतिदिन बलात्कार जैसे कई र्दुव्यवहार स्त्रियों के खिलाफ, कानून-व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए बदस्तूर जारी हैं.
एक 20 वर्षीय युवती के अपनी इच्छानुसार गैरजातीय युवक से विवाह करने पर उसे संताल आदिवासी पंचायत द्वारा सामूहिक बलात्कार का ‘दंड’ दिये जाने से पूरा देश स्तंभित है.
ऐसा अमानवीय, क्रूर, जघन्यतम फैसला पहली बार देखने-सुनने को मिला. दिल दहला देनेवाली बीरभूम की इस अत्यंत शर्मनाक घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खाप पंचायत और ‘कंगारू अदालतों’ जैसी अनेक असंवैधानिक और अप्रशासकीय संस्थाएं महिलाओं को इसी प्रकार दंड देने का अपराध करती रहेंगी और उनके नैतिक और नागरिक अधिकारों को अपराध सिद्ध करते हुए स्वयं ही दंड दे कर समाज में शुचिता और नैतिकता को बरकरार रखने का दंभ भी खुलेआम भरती रहेंगी. हमें यह समझने के लिए और कितना समय चाहिए कि स्त्रियों का सम्मान ही देश का वास्तविक सम्मान है?
पूनम पाठक, ई-मेल से
