इधर हमारा पूरा देश 65वां गणतंत्र दिवस मना रहा था और ठीक उसी समय पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की एक बेटी जिले के एक सरकारी अस्पताल में मृत्यु-सी वेदना झेल रही थी.
सरेआम पंचायत के अधम, अशोभनीय, फैसले का पालन पूरे गांव ने बड़ी ‘ईमानदारी’ से किया. धिक्कार है ऐसी व्यव्स्था पर, धिक्कार है उन पंचायतों पर जो गांव-घर की बेटियों को सुरक्षा देने के नाम पर अमानुषिक दंड का फैसला सुनाती हैं.
हम महिला हक की आवाज उठाते हैं, संसद में 33 फीसदी आरक्षण की बात करते हैं, महिलाओं को देवी, शक्ति, दुर्गा का अवतार मानते हैं, लेकिन पूरा गांव जब नर-पिशाच बन कर अपनी बेटी की अस्मत लुटते देखता रहा, तो क्या कहेंगे इसे? यह कानून, देश और समाज के लिए एक चुनौती है. बहुत हो गया, क्या हमें इस घटना पर शर्मसार नहीं होना चाहिए?
पद्मा मिश्र, जमशेदपुर
