।। डॉ बुद्धिनाथ मिश्र।।
(वरिष्ठ साहित्यकार)
एक बार जंगल के जीवों ने विचार किया कि सिंह हमेशा वन का राजा क्यों बने. जंगल में भी लोकतंत्र की भांति चुनाव कराया जाये. सो, चुनाव हुआ और बहुमत के बल पर बंदर वन का राजा निर्वाचित हो गया. बंदरों ने अपनी बिरादरी की जीत पर खूब जश्न मनाया. एक डाल से दूसरी डाल पर उछल-उछल कर किलकारियां कीं. कच्चे-पक्के फल खाये-चबाये और तोड़ कर फेंक डाले. टहनियां उखाड़ी और पत्तोंको नोच डाला. बेचारे पेड़ बंदरों का सब उत्पात सहते रहे, क्योंकि जंगल में लोकतंत्र आ गया था, और जो जीत गया, उसे अनुशासन तोड़ने का पूरा हक मिल गया था. कुछ ही दिनों में आम बंदर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जंगल को तहस-नहस कर दिया.
एक दिन सिंह को भूख लगी. उसने एक मेमने को धर दबोचा. बकरी ने देखा कि उसका लाल खूंखार सिंह के पंजों में तड़प रहा है. वह बंदरों के मुखिया के पास गयी और बोली कि मैंने आपको वोट देकर जिताया था. अब मेरे लाल को सिंह की गिरफ्त से बचाइए. मुखिया ने बंदरों का जत्था इकट्ठा किया और चल पड़ा उस सिंह की ऐसी-तैसी करने. बकरी की पीठ पर बैठा वह वानर-राज रास्ते भर बकरी को दिलासा देता रहा कि तुम चिंता मत करो. मैं इस भ्रष्ट और अत्याचारी सिंह को खत्म कर दूंगा. घटनास्थल नजदीक आया तो बंदर मुखिया बकरी की पीठ से उछल कर पेड़ की डाल पर चढ़ गया. वह दांत किटकिटाता हुआ एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता रहा और नीचे सिंह दहाड़ कर मेमने का पेट फाड़ता रहा. जब सिंह काम तमाम कर आराम करने दूर की झाड़ी में चला गया, तब पसीने से तर-बतर बंदर नीचे उतरा और अपनी टोपी से पंखा झल कर पसीना सुखाने लगा. रोती-बिलखती बकरी पास आयी और मिमियाने लगी- हाय मेरा लाल, बड़ा धोखा हुआ जो इस बंदर पर भरोसा किया. बंदर के बहकावे में आकर मैं अपना लाल खो बैठी.
बंदर ने कहा- देख बकरी, तेरा मेमना बचा या नहीं, यह दीगर बात है, मगर मेरी कोशिश में कोई कमी रही तो बता.
पिछले एक सप्ताह से दिल्ली में हूं और लोकतंत्र के नाम पर जो उत्पात हो रहा है, उसको करीब से देखता रहा हूं. मैंने यह भी देखा कि मीडिया का कैमरा घूमते ही लोग कैसे अभिनय करने लगे हैं. कैसे छोटे-बड़े ‘आप’ अभिनेता राजनीति के ‘आइटम सांग’ पर ईल नाच नाचने के लिए आतुर थे. उनको यकीन था कि भलेमानुस बन कर वे जनसेवा करेंगे तो गुलजारी लाल नंदा बन कर रह जायेंगे. वे राजनीति में राजनारायण बनना चाहते थे, इसीलिए कैमरे के सामने ऊल-जुलूल काम करने और कुछ भी अनाप-शनाप कहने के लिए तत्पर थे. वे चाहते हैं कि आम चुनाव तक यह नौटंकी जारी रहे, जिससे प्रभावित होकर लोग उन्हें देश की बागडोर सौंप दें. उसके बाद देश की वही गति होगी, जो दिल्ली की आज हो रही है. आश्चर्य इस बात का है कि लोग कैसे यह मान बैठे कि भ्रष्टाचार के सिंहों को ये बंदर मार भगायेंगे.
बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का नाम हिंदी गजल के बचपन को संवारनेवालों में लिया जाता है. सबसे पहले हिंदी गजल की प्राण प्रतिष्ठा उन्होंने की थी, मगर आज जब सारा देश गणतंत्र दिवस का जश्न मना रहा है, मुङो सबसे ज्यादा अपने युग के चारण ‘रंग’ जी की बहुत याद आ रही है. देश की आजादी मिलने पर उन्होंने जो कविता लिखी थी, वह आज 65 साल बाद भी प्रासंगिक है : ओ विप्लव के थके साथियो/ विजय मिली, विश्रम न समझो/ उदय प्रभात हुआ फिर भी तो/ छायी चारों और उदासी/ ऊपर मेघ भरे बैठे हैं/ किंतु धरा प्यासी की प्यासी/ जब तक सुख के स्वप्न अधूरे/ तब तक पूरा काम न समझो..
लेकिन चेतनाशील कवियों की बात सत्ता मद में चूर राजनेता न तब सुनते थे, न आज सुनते हैं. आजादी से पहले रंग जी की कविताएं जन-जन के अधरों पर नाचती-थिरकती थीं और श्रोताओं को देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा देती थीं. उनका जन्म 14 नवंबर, 1919 को तत्कालीन संयुक्त प्रांत (आज के उत्तर प्रदेश) के नगला कटीला (जिला एटा) में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था. उनका निधन 8 जून, 1984 को हुआ था. सत्तर के दशक में कई बार उनके साथ काव्यमंच साझा करने का मुङो सौभाग्य मिला था और उनकी वाणी के जादू के समक्ष अपने को नतमस्तक होते मैंने बारंबार अनुभव किया था. उनकी वेशभूषा में कितनी सादगी थी! खाड़ी का सफेद कुर्ता-धोती और गांधी टोपी. बस यही उनका बाना था, मगर उनकी वाणी में वह सम्मोहन था कि श्रोता देर तक उनको सुनते रहने के लिए बाध्य हो जाते थे. अपनी छात्रवस्था में मैंने उनका एक लंबा गीत साप्ताहिक हिंदुस्तान में पढ़ा था, जो भीतर तक मुङो आंदोलित कर गया था: नगर-नगर बढ़ रही अमीरी/ मेरा गांव गरीब है/ अपना गांव गरीब है/ सबका गांव गरीब है..
‘रंग’ जी आपादमस्तक कवि थे. पूर्णत: मौलिक, कोई शिक्षा-दीक्षा नहीं. उनकी कविता गहनतम अनुभूति की सरलतम अभिव्यक्ति होती थी. जग को संवारने की चिंता में वे अपने को सहेजना-संवारना भूल गये. इसीलिए उनका कोई संग्रह बाजार में उपलब्ध नहीं है. उनके बालसखा और घनिष्ठ मित्र बालकृष्ण गुप्त (फिरोजाबाद) ने बाद में ‘श्री रंग स्मृति संस्थान’ बना कर उसके माध्यम से उनके गीतों, गजलों और राष्ट्रीय कविताओं का संग्रह निकाला, जो आत्मीय जनों तक ही सीमित रहा. इस दिशा में कासगंज (एटा) की डॉ शारदा जोशी का विशद शोध उल्लेख्य है. गुप्त जी ने ही एक बार दिल्ली में तत्कालीन सांसद और सुकवि उदय प्रताप सिंह जी के घर पर ‘रंग’ जी के जीवन के बारे में चर्चा करते हुए बताया था कि किसान परिवार में जन्मे रंग जी के पिता की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, मगर वे बहुत ही स्वाभिमानी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे.
रंग जी ने गणतंत्र दिवस के उत्सवों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कभी कहा था-वैजयंती तुम मनाओ, हम अभी संघर्ष-रत हैं.’ आज का साहित्यकार भी उसी तरह संघर्ष-रत है और आज की जनता भी एक ऐसे भगीरथ को तलाश रही है, जो पहले गंगा बचाये और फिर उसे देश के सभी उपेक्षित प्यासों तक पहुंचाए. इस गणतंत्र दिवस पर हमारी भी वही ख्वाहिश है, जो कभी हम सबके अग्रजन्मा ‘रंग’ जी ने की थी:
गीता-गायक जैसा सारथी चाहिए,
इति कल तक हो गयी आज अथ चाहिए।
विधिवत विधि का रिक्त कमंडल हो गया,
गंगा तो आ गयी, भगीरथ चाहिए।।
