80वां स्वतंत्रता दिवस : संघर्ष, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का विजयपथ

भारत की 80 वर्ष की यात्रा का सबसे बड़ा सबक है आत्मनिर्भरता. आजादी के बाद भारत ने विदेशी सहायता और आयात पर निर्भरता कम करने का संकल्प लिया. पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी सलाहकार समिति, वित्त मंत्रालय के सदस्य विवेकानंद शांडिल्य का आलेख.

स्वतंत्रता दिवस का यह 80वां वर्ष केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की अद्भुत यात्रा का प्रतिबिंब है. आठ दशकों में भारत ने हर संघर्ष को झेला, हर चुनौती का सामना किया और हर बार अपनी मूल भावना को जीवित रखा. वसुधैव कुटुंबकम् और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे शाश्वत विचार भारत की आत्मा रहे हैं.

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत गरीबी, अशिक्षा और बुनियादी ढांचे की कमी से जूझ रहा था. लेकिन इन कठिनाइयों के बीच भी भारत ने लोकतंत्र को मजबूती से थामा और विकास की राह पर कदम बढ़ाए. यह वही राष्ट्र है जिसने भूख और अभाव से लड़ते हुए विज्ञान, तकनीक और शिक्षा में अपनी पहचान बनाई.

भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र बना

आज भारत केवल एक विकासशील देश नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और अंतरिक्ष में अपनी जगह बनाने वाला अग्रणी राष्ट्र है. प्रकृति रक्षति रक्षितः और नर सेवा ही नारायण सेवा है जैसे विचारों को साथ लेकर भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है.

जहां कुछ देश युद्ध और साम्राज्यवाद की नीतियों में उलझे हैं, वहीं भारत दुनिया को शांति का संदेश दे रहा है. यह वही भूमि है जहां बुद्ध ने करुणा का मार्ग दिखाया और जहां से अहिंसा का संदेश पूरी दुनिया में फैला. भारत ने हमेशा युद्ध को नकारा है, लेकिन जब बात आतंकवाद की आती है तो भारत ने मानवता के दुश्मनों को ललकारा भी है और प्रहार भी किया है. हम कृष्ण के वंशज हैं - जहां प्रेम है वहां मुरली की मधुर धुन बजती है और जब कोई कंस मानवता का शत्रु बन खड़ा होता है तो सुदर्शन चक्र का चलना भी आवश्यक हो जाता है.

ऑपरेशन सिंदूर से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक

ऑपरेशन सिंदूर से लेकर सर्जिकल स्ट्राइक तक, भारत ने हर बार मानवता के हित में निर्णायक कदम उठाए हैं. यह केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि यह संदेश है कि भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा और मानवता की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित है. भारत की पहचान अध्यात्म है. हमारी मूल भावना में पूरा विश्व एक परिवार है. यही कारण है कि भारत ने हर संकट में वैश्विक सहयोग और साझेदारी का मार्ग चुना. चाहे कोरोना महामारी हो या जलवायु परिवर्तन, भारत ने दुनिया को दिखाया कि संस्कृति और विज्ञान का संगम ही स्थायी समाधान है.

भारत की 80 वर्ष की यात्रा का सबसे बड़ा सबक है आत्मनिर्भरता. आजादी के बाद भारत ने विदेशी सहायता और आयात पर निर्भरता कम करने का संकल्प लिया. हर संकट ने हमें यह सिखाया कि आत्मनिर्भरता ही स्थायी विकास का मार्ग है. आज भारत मेक इन इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे अभियानों के माध्यम से न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दे रहा है कि आत्मनिर्भरता ही सच्ची स्वतंत्रता है. प्रधानमंत्री का लोकल के लिए वोकल का आह्वान इस आत्मनिर्भरता की भावना को जन‑जन तक पहुंचा रहा है.

2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य

प्रधानमंत्री का 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य केवल पर्यावरणीय संकल्प नहीं, बल्कि भारत की नई दिशा का प्रतीक है. यह वही राष्ट्र है जो कभी गरीबी से लड़ रहा था और आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान और हरित ऊर्जा में अपनी पहचान बना रहा है.

भारत की 80 वर्ष की यात्रा हमें यह सिखाती है कि संघर्ष चाहे जितना बड़ा हो, यदि मूल भावना अटल रहे और आत्मनिर्भरता को मार्गदर्शक बनाया जाए तो राष्ट्र हर चुनौती को अवसर में बदल सकता है. स्वतंत्रता दिवस का यह 80वां वर्ष हमें गर्व दिलाता है कि भारत ने न केवल अपनी चुनौतियों को पार किया, बल्कि दुनिया को शांति, सहयोग और मानवता का मार्ग दिखाया. भारत की आत्मा आज भी वही है-वसुधैव कुटुंबकम्.

आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि आने वाले दशकों में भारत न केवल तकनीकी और आर्थिक शक्ति बनेगा, बल्कि अपनी संस्कृति, अध्यात्म और आत्मनिर्भरता से दुनिया को दिशा देगा. यही है भारत की असली पहचान - संघर्ष से आत्मविश्वास तक, आत्मनिर्भरता से विश्व नेतृत्व तक.


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