डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
लोकतंत्र में चुनाव हमें अपनी किस्मत अपने ढंग से संवारने का अवसर देता है, हालांकि कुछ विद्वान लोग इसे अवसर के बजाय भ्रम कहना ज्यादा पसंद करते हैं. जो भी हो, चुनाव में हम यह चुनाव कर सकते हैं कि किसका चुनाव करें, करें या भी या नहीं, या अपनी ओर से किसी और को ही किसी का चुनाव कर लेने दें.
चुनाव हमें अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारने का जैसा नायाब मौका मुहैया कराता है. अपने पैरों पर यह कुल्हाड़ी भी हम अपने-अपने तरीके से मार सकते हैं. मसलन, कुछ लोग वोट देकर यह काम करते हैं, तो कुछ लोग वोट न देकर.
वोट देकर आनेवाले लोग यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि हमने अपने पैरों पर अपनी पसंद के उम्मीदवार या पार्टी की कुल्हाड़ी मारी. उनकी यह पसंद भी कोई उनकी बुद्धि या विवेक पर आधारित नहीं होती, बल्कि मधुमेह, बीपी जैसी बीमारियों की तरह वंशानुगत होती है. कोई आदमी किसी पार्टी को सिर्फ इसलिए पसंद करता है, क्योंकि उसके बाप भी उसी पार्टी को पसंद करते थे और उसके बाप उस पार्टी को इसलिए पसंद करते थे, क्योंकि उसके बाप भी उसी पार्टी को पसंद करते थे.
अकसर मतदाता किसी पार्टी को जिताने के लिए वोट देने नहीं जाता, बल्कि सत्ताधारी दल को हराने के लिए वोट देने जाता है, भले ही इसके लिए उसे उससे भी ज्यादा खराब दल को वोट क्यों देना पड़े. वह सत्ताधारी दल के खिलाफ यह सोचकर वोट दे आता है कि हमारा तो जो होगा, सो होगा, लेकिन तुम्हें भी हम रसातल में पहुंचाकर ही दम लेंगे. इस तरह वह भी देवानंद की तरह अपनी बरबादियों का जश्न मनाता चला जाता है.
कुछ लोग अपना वोट इतनी दरियादिली से देते हैं कि दानवीर कर्ण की तरह जो भी उनके दरवाजे पर मांगने आये, उसी को देने की हामी भर लेते हैं.
नेता भी कृष्ण की तरह वेश बदलकर उससे उसका कवच-कुंडल छीन ले जाते हैं, जिसके बाद उसे जीवन के महाभारत में कोई नहीं बचा सकता. कुछ मतदाता उदारतावश सभी को हां कह देते हैं और फिर ईमानदारी से सभी को वोट दे भी आते हैं. कुछ मतदाता उम्मीदवार की काबिलियत का आकलन इस बात से करते हैं कि वह वोट के बदले फौरन क्या दे सकता है? ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ के सिद्धांत का अनुसरण करनेवाला ऐसा मतदाता यह मानकर चलता है कि जो उम्मीदवार फौरन कुछ नहीं दे सकता, वह जीतने के बाद ही क्या दे पायेगा?
इसीलिए समझदार उम्मीदवार उसे कभी नोटों से तो कभी दारू से नहलाकर भविष्य में भी उसी तरह से नहलाते रहने की उम्मीद बंधा देते हैं. इस काम में उम्मीदवार की मदद तमाम तरह के कारोबारी करते हैं, जिनमें हवाला-कारोबारियों का योगदान सबसे ज्यादा रहता है. जीतने के बाद वे इन कारोबारियों पर अंकुश क्यों नहीं लगा पाते, समझा जा सकता है. महंगाई कम करने के वादे पर जीतकर आनेवाले उम्मीदवार और उनके दल जीतने पर महंगाई क्यों बढ़ने देते हैं, सो इन कारोबारियों का एहसान उतारने के लिए ही.
कुछ लोग राजनीतिक पार्टियों को बारी-बारी से वोट देने पर विश्वास करते हैं और पिछली बार जिस पार्टी को वोट दिया था, अगली बार उसकी विरोधी पार्टी को वोट दे देते हैं. विरोधी पार्टी की दुनिया इसी उम्मीद कायम रहती है. तमिलनाडु में ऐसा ही होता था, पर इस बार नहीं हुआ. केरल में भी ऐसा होता था और इस बार भी हो गया. पश्चिम बंगाल में जो होना था, वही हुआ और कांग्रेस की दृष्टि से असम में जो नहीं होना था, वह हो गया.
