पश्चिम एशिया संकट और भारत की भूमिका, पढ़ें अनिल त्रिगुणायत का आलेख

Iran US War: यह युद्ध कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है, लेकिन भारत इस युद्ध को खत्म करने में एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में सामने आ सकता है. पश्चिम एशिया के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध हैं. लिहाजा नयी दिल्ली लगातार इस संकट के हल के लिए संवाद और कूटनीति पर जोर दे रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत से बेहतर रिश्ते को स्वीकारते हैं. ऐसे ही, ईरान न सिर्फ भारत को अपना दोस्त बता रहा है, बल्कि हमारे तेल टैंकर होर्मुज के रास्ते लगातार आ भी रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी इस मुद्दे पर लगातार वैश्विक नेताओं के संपर्क में हैं. ऐसे में, यह मानने का कारण है कि भारत इस संकट को हल करने में संवाद और कूटनीति का रास्ता तलाश रहा है.

Iran US War: ईरान पर युद्ध थोपने के महीना भर बाद अमेरिका हांफने लगा है और इसके सबूत दिखने लगे हैं. कई अमेरिकी विमानों को मार गिराने के ईरान के दावों पर अगर विश्वास न किया जाये, तो भी कम से कम एक अमेरिकी विमान को निशाना बनाने और एक अमेरिकी पायलट के गायब होने की सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि उसे अमेरिका ने ढूंढ लिया है. यह भी स्पष्ट है कि ईरान को नेस्तनाबूद करने की अमेरिकी आक्रामकता अब होर्मुज जलडमरुमध्य को खोलने की जिद पर अड़ गयी है, लेकिन यूरोप के देश अब ट्रंप की महत्वाकांक्षा के रास्ते में बाधक बन रहे हैं. पहले साठ देशों ने होर्मुज के मुद्दे पर एक वर्चुअल बैठक की, जिसमें अमेरिका और चीन मौजूद नहीं थे, लेकिन भारत की मौजूदगी थी. उसमें यह प्रस्ताव जारी किया गया कि होर्मुज को खोलने का काम युद्ध के जरिये नहीं, बल्कि संवाद के जरिये ही हो सकता है. फिर अमेरिका और अरब देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में हमलों के जरिये होर्मुज को खोलने संबंधी प्रस्ताव दाखिल किया, लेकिन फ्रांस, रूस और चीन ने इस पर वीटो लगा दिया. ईरान पर अमेरिका-इस्राइल के हमले पर यूरोप के देश पहले ही सहमत नहीं थे. लेकिन होर्मुज के मुद्दे पर तो यूरोप के साथ रूस और चीन भी अमेरिका के साथ खड़े नहीं हैं.

जैसे-जैसे युद्ध खिंचता जा रहा है, इसे शुरू किये जाने की व्यर्थता सामने आ रही है. खाड़ी देशों का ही उदाहरण लें, तो वे बेकार ही इस युद्ध में फंस गये. अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ जमीनी हमले को अंजाम देता है, तो खाड़ी देशों को भीषण नुकसान होने की आशंका है. ईरान दरअसल वर्षों से अमेरिकी और इस्राइली युद्ध तकनीकों का गहराई से अध्ययन करता रहा है. उसने उसी के अनुरूप अपनी रक्षा तैयारियां कर रखी हैं. यही कारण है कि अमेरिका और इस्राइल की सैन्य तथा तकनीकी श्रेष्ठताओं तथा ईरान को पूरी तरह नेस्तनाबूद करने के अमेरिका-इस्राइल के दावों के बावजूद आइआरजीसी (इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स) लगातार न सिर्फ लड़ रहा है, बल्कि दुश्मन देशों को नुकसान भी पहुंचा रहा है.

बेशक अमेरिकी ताकत के आगे ईरान का कोई मुकाबला नहीं है. ईरान की युद्ध रणनीति जीत हासिल करने की है भी नहीं, वह तो एक राष्ट्र के रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखने और शत्रु देशों के लिए जीत को बेहद मुश्किल और खर्चीला बना देने की नीति पर काम कर रहा है. ईरान के पिट्ठू हिजबुल्लाह पहले से ही मैदान में थे. फिर इस्राइल के खिलाफ हूथी विद्रोही भी कूद पड़े. इससे इस्राइली रक्षा क्षमता पर दबाव बढ़ा है और आम इस्राइली भी नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल उठा रहा है. अमेरिका-ईरान के बीच के वार्ताकार और ओमान के विदेश मंत्री हमाद अल बुसैदी ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ में लिखा कि ‘अमेरिका अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खो चुका है’. उन्होंने इस्राइल पर भी गलत अनुमान लगाने और ट्रंप को एक घातक युद्ध में धकेल देने का आरोप लगाया है. वाशिंगटन देर-सबेर अगर इस युद्ध में विजयी होने की घोषणा करे, तो भी उसके परिणाम दुनिया को अगले अनेक वर्षों तक भुगतने पड़ेंगे.

इस युद्ध से जुड़े ट्रंप के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि ईरान पर एकतरफा हमला करने तथा युद्ध में साथ न देने वाले यूरोपीय नेताओं पर अपमानजनक टिप्पणियां करने के कारण अमेरिका तेजी से अपनी साख, अपने दोस्त और समर्थक खोता जा रहा है, लेकिन इन सबसे बेपरवाह ट्रंप अब भी अपने फैसले को सही ठहरा रहे हैं. उन्होंने कहा है, ‘ईरान के खिलाफ यह अभियान खत्म हो जाने के बाद हमारी दुनिया ज्यादा सुरक्षित होगी’, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत दिखती है. यह ठीक है कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश फिलहाल रणनीतिक संयम बरतने के बावजूद अमेरिका और इस्राइल के साथ खड़े रहेंगे, लेकिन ओमान, कतर और कुवैत का मानना है कि ईरान चूंकि पड़ोसी देश है, लिहाजा उसके साथ उसी तरह का रवैया अपनाना पड़ेगा.

इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी अंदरूनी समीकरण खाड़ी देशों के बीच अलगाव और तनाव बनाये रखेंगे. ईरान के कमजोर होने से इस्राइल की ताकत निस्संदेह बढ़ेगी. ट्रंप यह चाहते भी है, लेकिन अरब और मुस्लिम देशों में खासकर निचले स्तरों पर इस्राइल के प्रति अविश्वास बढ़ेगा. इस कारण भी युद्ध के बाद की दुनिया अशांत ही रहने वाली है. चीन, रूस और भारत जैसे देशों के लिए, जिनके अपने गहरे भू-राजनीतिक, भू-रणनीतिक और भू-आर्थिक हितों के कारण ईरान और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी), दोनों से बेहतर संबंध हैं, अमेरिका की मौजूदा ईरान-विरोधी आक्रामकता के कारण मुश्किलें बढ़ गयी हैं. यह युद्ध कब तक चलेगा, कहना मुश्किल है. पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता के दावे को खुद ईरान ने ही खारिज कर हमारे पड़ोसी देश को उसकी असलियत बता दी है. ऐसे में, भारत इस युद्ध को रोकने में एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में सामने आ सकता है. भारत के पश्चिम एशिया के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं. लिहाजा नयी दिल्ली लगातार इस संकट के हल के लिए संवाद और कूटनीति पर जोर दे रही है. दूसरी ओर, ईरान न सिर्फ भारत को अपना दोस्त बता रहा है, बल्कि हमारे तेल टैंकर होर्मुज होकर आ भी रहे हैं.

ईरान में फंसे हजारों भारतीय छात्रों और नागरिकों को वहां से सुरक्षित निकाल कर लाया गया है, तो यह ईरान की मदद के बगैर संभव नहीं था. पाकिस्तान की तुलना में, जो ईरान युद्ध खत्म करने के लिए मध्यस्थ बनने का बार-बार दावा कर रहा था, भारत का सम्मान वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक है. दुनियाभर के देश भारत की क्षमता से वाकिफ हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप तक भारत से अपने बेहतर संबंध और प्रधानमंत्री मोदी से अपनी दोस्ती के बारे में बता चुके हैं. भारत की चिंता सिर्फ युद्ध से हो रहे नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी चिंता ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में रह रहे अपने लोगों की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है. विदेश मंत्री जयशंकर ने पश्चिम एशिया संकट पर जी-7 के अपने समकक्षों से बात की है. खुद प्रधानमंत्री वैश्विक नेताओं से संपर्क में है. ऐसे में, यह मानने का कारण है कि भारत इस संकट को हल करने में संवाद और कूटनीति की गुंजाइश तलाश रहा है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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