उत्तराखंड में लंबी राजनीतिक उठापटक में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है. इससे कांग्रेस कुछ मजबूत और भाजपा कमजोर ही हुई है. इसका कुछ प्रभाव राज्यों के चुनाव में भी देखने को मिल सकता है. इससे पूर्व भी यह पार्टी ऐसी गलतियां करती रही है. ये सब उसकी कमजोरी और आंतरिक भय को ही दर्शाता है. शुभ कर्मों या पुरुषार्थ से ही प्रारब्ध या भाग्य बनता, बिगड़ता और चमकता है.
हिंदुत्व को लेकर चलने वाली पार्टी खुद यह नहीं समझ पा रही है, यही तो इसका दुर्भाग्य है. कथनी और करनी में अन्य पार्टियों की भांति इसमें भी कोई अंतर नहीं रह गया है. अत: इसे अब विस्तृत जनजागृति को देखते हुए अपनी कार्यशैली में पारदर्शी और ठोस जनवादी आमूलचूल परिवर्तन की सख्त जरूरत है तभी यह अपने अस्तित्व को कायम रखते हुए आगे बढ़ सकती है.
वेद प्रकाश, दिल्ली
