पवन के वर्मा
पूर्व प्रशासक एवं राज्यसभा सदस्य
उत्तराखंड में भाजपा का कृत्य निश्चित रूप से पवित्र संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है, पर मैं इस प्रकरण को सत्ता के अभिमान के प्रतीक के रूप में देखता हूं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस के विधायकों को लुभाने के लिए संगठित प्रयास किये गये. आम तौर पर इसे हॉर्स-ट्रेडिंग यानी खरीद-फरोख्त कहा जाता है, और संविधान के 42वें संशोधन में उल्लिखित दल-बदल विरोधी कानून की सीधी अवहेलना है. विधानसभा में शक्ति-परीक्षण से एक दिन पहले केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति शासन लगाना अनुच्छेद 356 का खुला दुरुपयोग था और बोम्मई मामले में दिये गये निर्देशों के विरुद्ध था. उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उचित ही इसे ‘लोकतंत्र की जड़ों पर’ प्रहार बताया है.
न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन को हटाते हुए यथा-स्थिति बहाल किया और शक्ति परीक्षण के लिए 29 अप्रैल की तारीख निर्धारित की. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, पर शक्ति परीक्षण को हरी झंडी दे दी है. भाजपा की केंद्र सरकार का असंवैधानिक रवैया सबके सामने है.
मसले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर तो अदालत में चर्चा होगी, पर भाजपा की छवि निश्चित रूप से धूमिल हुई है. जनता की अदालत में यह बात पैठने लगी है कि 2014 में उच्च नैतिक आधार पर सत्ता में आयी पार्टी बिना किसी सिद्धांत के स्वार्थ के दलदल में धंस गयी है. यही कारण है कि उत्तराखंड की विफलता को न सिर्फ उसके कानूनी नतीजों के आधार पर देखा जायेगा, बल्कि मोदी के सत्ता में आने के बाद भाजपा में आये बदलाव के प्रतीक के रूप में भी देखा जायेगा.
जिस तरह से भाजपा अपने मुख्य चुनावी वादों से पलटी, वह उसके समर्थकों के लिए भी बड़ा झटका था. अपने वादों को ‘चुनावी जुमला’ कह कर भाजपा ने अपनी विश्वसनीयता खो दी.
किसानों को लागत से 50 फीसदी अधिक लाभ के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के वादे से मुकरना भी ऐसा ही था. हर साल दो करोड़ रोजगार मुहैया कराने में मिली असफलता ने युवाओं को इंगित कर दिया है कि भाजपा के वादे महज चुनाव जीतने के लिए थे, पूरे करने के लिए नहीं. हकीकत यह है कि रोजगार सृजन की मौजूदा दर पिछले छह वर्षों में सबसे नीचे है.
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ सरकार बनाना भाजपा के विचारधारात्मक खोखलेपन का दूसरा उदाहरण था. विचारधारा के स्तर पर दोनों परस्पर विपरीत छोर पर हैं. फिर भी, सिर्फ सत्ता के लिए भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में ऐसी सरकार बनायी, जो शुरू से ही अस्थिर है.
तीसरा कारक धन बल है, जो भाजपा चुनावी राजनीति में लेकर आयी है. कुछ महीने पहले हुए बिहार चुनाव में यह बहुत हद तक साफ था. हेलीकॉप्टरों के बेड़े तैनात थे. नेताओं के लिए महंगे होटल बुक थे. प्रमुख अखबारों में पार्टी के बड़े-बड़े विज्ञापन थे. लगता था कि पार्टी द्वारा खर्च की कोई सीमा नहीं है.
बिहार और अन्य चुनावों ने तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटने के स्वार्थी रवैये को भी उजागर किया. घरवापसी, लव जिहाद, बीफ बैन जैसे अभियान समुदायों बांटने के लिए चलाये गये. भाजपा, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों के वरिष्ठ नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिये, पर उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. समाज में अस्थिरता व असहिष्णुता का माहौल बनाने के लिए विकृत विचारधारा का सहारा लिया गया, जिसने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को मजाक में बदल दिया.
सत्ता के इस दंभ को संसद ने भी देखा है. वस्तु एवं सेवाकर विधेयक समेत विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष को रचनात्मक सहयोग के लिए तैयार करने की कोशिश का ऐसा खराब प्रदर्शन शायद ही किसी अन्य सत्तारूढ़ दल के रिकॉर्ड में होगा. हाल में हमने देखा है कि किस तरह गैर वित्त विधेयकों को वित्त विधेयक के रूप में पेश करने का सिलसिला चल पड़ा है, ताकि राज्यसभा का सामना करने की नौबत न आये, क्योंकि राज्यसभा में सरकार अल्पमत में है.
ये कारक इस बात को समझने में मददगार हैं, जो भाजपा ने पहले अरुणाचल प्रदेश और फिर उत्तराखंड में किया है. यानी हम ऐसे दल का सामना कर रहे हैं, जो यह मानता है कि लोकसभा में अपने भारी बहुमत के बल पर उसे नीतियों, वैधानिकता व संविधान के संदर्भ से परे कुछ भी करने का अधिकार है.
सत्ता उन्हीं लोगों को सौंपी जानी चाहिए, जो इसे उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से संचालित कर सकें. जब ऐसा नहीं होता, तो उत्तराखंड जैसे प्रकरण होते हैं. इसी कारण, मेरी राय में, उत्तराखंड को सिर्फ लोकतंत्र और संवैधानिक सिद्धांतों के उल्लंघन के लिए ही नहीं, बल्कि सत्ता के दंभ के लिए भी याद किया जायेगा.
