भारत ने अमेरिका के साथ हाल ही में जिस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं उसकी ओर मार्क्सवादी साम्यवादी दल को छोड़ किसी और का ध्यान उतना नहीं गया है जितना जाना चाहिए. शायद इसका कारण पांच जगह विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां हैं या फिर आइपीएल का नशा! आज का भारत 1950 के दशक वाला गुट निरपेक्ष देश नहीं, जिसका टकराव हर कदम पर शीतयुद्ध के युग में नव साम्राज्यवादी अमेरिका से होता था. नेहरू सरकार का रुझान समाजवादी आर्थिक विकास का था और यह स्वाभाविक था कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ हमारी आत्मीयता कहीं गहरी थी.
इन्हीं वर्षों में अमेरिकी अनाज पर निर्भरता ने भी मनमुटाव बढ़ाया. इसके अलावा पाकिस्तान को सैनिक संधि मित्र बनाने के बाद अमेरिका ने उसकी बेहिचक हथियारबंदी की, जिसका नुकसान भारत को बारंबार उठाना पडा. कुल मिला कर आजादी के बाद से 25-30 वर्षों तक भारत में अमेरिका की पहचान हमारे शत्रु के मित्र और हम पर दबाव डालनेवाली ही रही. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के दौरान तनाव घातक विस्फोट की कगार तक पहुंच गये थे. इसके ही कारण आज बदले सामरिक परिप्रेक्ष्य में भी हम उभयपक्षीय सामरिक रिश्ते के बारे में तटस्थता से सोचने में असमर्थ हैं.
अमेरिका के साथ हमारे सामरिक संबंध इस घड़ी अचानक नहीं बदल रहे और न ही यह बदलाव किसी गुप्त साजिश का परिणाम है. 1990 वाले दशक से क्रमश: कायाकल्प जारी है. एनडीए-1 के कार्यकाल में जसवंत-टालबौट संवाद से जो प्रक्रिया आरंभ हुई, वह लगातार गतिशील रही है. मनमोहन सरकार ने परमाणविक ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग वाले करार पर हस्ताक्षर कर इस नाते को भारतीय सामरिक राजनय में महत्वपूर्ण बनाने का प्रयास किया. आज यह निर्विवाद है कि साम्यवादियों को छोड़ सभी राजनीतिक दल अमेरिका के साथ बेहतर संबंधों का समर्थन करते हैं. तो क्या हाल में संपन्न सुरक्षा सहकार समझौता स्वाभाविक ‘अगला कदम’ है या यह सरकार किसी लालच-भोलेपन में देश की संप्रभुता का संकुचन स्वीकार रही है?
जरा पड़ोस के तथा अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य पर नजर डालें. पाकिस्तान और चीन की धुरी भारत को निर्बल बना खूंटे से बांधे रखने के लिए आमादा है. श्रीलंका, म्यांमार तथा मालदीव एवं पाकिस्तान में अपनी नौसेना के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर वह हमारे गले में जहरीली मोतियों की माला पहनाने पर आमादा है. दक्षिणी चीनी सागर में वियतनाम नाम के साथ भारत का सहयोग उसे रास नहीं आता. जापान के करीब आने के भारतीय प्रयास भी चीन को आशंकित करते हैं. ऐसे में अमेरिका के साथ सामरिक सहकार समझदार सोच ही दर्शाता है.
इस संदर्भ में सैनिक संधि-गंठबंधन, हथियारों की खरीद-फरोख्त तथा दीर्घकालीन सामरिक सहकार के समझौते के बीच का फर्क समझना जरूरी है. पिछले पंद्रह बीस साल में भारत ने जड़ रूढ़िगत जैसी विचारधारा की अनेक बेड़ियों से छुटकारा पाया है. भूमंडलीकरण को सहर्ष गले लगाने के बाद ‘पूंजीवादी’ अमेरिका का राक्षसीकरण सहज नहीं! नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का समर्थन करने के बारे में भाजपा और कांग्रेस में मतभेद नहीं. इसके बाद ताजातरीन सामरिक सहकार- सहयोग की परियोजना मे मीनमेख निकालना बेमानी है.
भारत को अहसास है कि चीन की आर्थिक व सैनिक ताकत का मुकाबला हम अकेले नहीं कर सकते. दक्षिण-पूर्व एशिया में तथा हिंद महासागर में भी हमारी नौसैनिक क्षमता सीमित है. अमेरिका को वाहनों-उपकरणों के रख-रखाव की सुविधाएं सुलभ कराना या युद्धाभ्यास में साझेदारी के कार्यक्रम संप्रभुता का हनन नहीं, बल्कि भविष्य में अपनी सामरिक क्षमता के निर्माण तक ऐसा सहकार जरूरी है. इसके अभाव में एशियाई शक्ति-संतुलन हमारे राष्ट्रहित के प्रतिकूल होता जायेगा.
चीन की अभी तक की प्रतिक्रिया संयत रही है. संभवत: वह हमारे रक्षा मंत्री की निकट भविष्य में प्रस्तावित चीन यात्रा के अवसर पर इस मुद्दे को उठायेगा! बहरहाल हमें यह याद रखने की जरूरत है कि चीन के मामले में हमारे और अमेरिकी हितों में गहरा सन्निपात है. इस वक्त रूस यूक्रेन-क्रीमिया में उलझा है. यूरोप कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद से लहूलुहान है. चीनी-पाकिस्तानी गंठजोड़ से उत्पन्न दीर्घकालीन सामरिक चुनौती का सामना करने के लिए अन्य विकल्प सुलभ नहीं. विडंबना यह है कि यूपीए के कार्यकाल में चीन के साथ व्यापार के दैत्याकार विस्तार ने इस सामरिक गुत्थी को बुरी तरह उलझा दिया है. यहां भी फिलहाल भारत और अमेरिका के हितों में संयोग संभव है.
पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
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