न्याय का शासन

इतिहास गवाह है कि किसी देश में लोकतंत्र तभी तक कायम रहता है, जब तक उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिनमें न्यायपालिका भी एक है, पर जनता का भरोसा बना रहे. शायद यही बात राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के जेहन में भी रही होगी, जो उन्होंने भोपाल में आयोजित न्यायाधीशों के कार्यक्रम ‘जजेज रिट्रीट’ में कहा कि ‘हमें […]

इतिहास गवाह है कि किसी देश में लोकतंत्र तभी तक कायम रहता है, जब तक उसकी लोकतांत्रिक संस्थाओं, जिनमें न्यायपालिका भी एक है, पर जनता का भरोसा बना रहे. शायद यही बात राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के जेहन में भी रही होगी, जो उन्होंने भोपाल में आयोजित न्यायाधीशों के कार्यक्रम ‘जजेज रिट्रीट’ में कहा कि ‘हमें त्वरित न्याय की व्यवस्था करनी ही होगी, तभी न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा कायम रह सकता है’. न्यायिक प्रक्रिया को लेकर यह कहावत दुनियाभर में प्रचलित है- ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ यानी न्याय में देरी भी एक प्रकार का अन्याय है. लेकिन, अपने देश में न्याय में देरी के उदाहरण निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में भरे पड़े हैं. अदालतों में लंबित मामलों का बड़ा पहाड़ खुद इसका प्रमाण है. ‘जजेज रिट्रीट’ कार्यक्रम में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री सदानंद गौड़ा ने भी माना कि देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या तीन करोड़ से अधिक होना एक बड़ी चिंता का सबब है. उन्होंने रविवार सुबह ट्वीट के जरिये भी अपनी इस चिंता का इजहार किया. लेकिन, देश को इस चिंता से मुक्ति दिलाने की जिम्मेवारी भी उन्हीं के मंत्रालय के ऊपर है.

सूचना का अधिकार कानून के तहत मांगी गयी जानकारी में केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने बताया है कि एक मार्च, 2016 को देश के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 44 फीसदी पद खाली पड़े थे. देश के 24 उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के कुल 1056 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 465 रिक्त पड़े हैं. एक आंकड़े के मुताबिक निचली अदालतों में भी करीब एक चौथाई पद रिक्त हैं. यह स्थिति तब है, जबकि आबादी के अनुपात में हमारे देश में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या पहले से काफी कम है.

भारत में प्रति दस लाख आबादी पर न्यायाधीशों के मात्र 17 पद स्वीकृत हैं, जबकि विश्वबैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह आंकड़ा आस्ट्रेलिया में 58, कनाडा में 75, फ्रांस में 80 और ब्रिटेन में 100 है. न्यायिक आयोग की 2014 की रिपोर्ट में अपने देश में भी प्रति दस लाख आबादी पर जजों की संख्या 50 तक बढ़ाने यानी मौजूदा संख्या से करीब तीन गुना करने की सिफारिश की गयी थी. पिछले कुछ महीनों से अकसर यह सुनने को मिलता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम

प्रणाली और केंद्र सरकार के बीच गतिरोध के चलते रिक्त पदों को भरने में देरी हो रही है, जबकि हकीकत यह है कि न्यायपालिका में रिक्तियों की लगभग यही स्थिति 2012 से पहले से है. जाहिर है, यह हमारे सिस्टम की विफलता का सूचक है.

लंबित मामलों की प्रकृति पर गौर करें तो बड़ी संख्या में घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न के मामले भी अदालतों में पांच-सात वर्षों से चल रहे हैं और इस दौरान परिवार के बुजुर्ग मुखिया तक को परेशान होना पड़ता है, जबकि इनमें ज्यादातर झगड़े पंचायत स्तर पर सुलझाये जा सकते थे, यदि पंचायतों में मुखिया और सरपंच के जरिये प्राथमिक न्याय उपलब्ध कराने की कारगर व्यवस्था होती. देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने हाल में एक पत्रिका को दिये विशेष इंटरव्यू में देश में लंबित मामलों की संख्या कम करने के लिए पांच कदम सुझाये थे. पहला, न्यायाधीशों और अदालतों की संख्या बढ़ानी होगी. दूसरा, न्यायाधीशों को नये सिरे से प्रशिक्षित करना होगा, ताकि उनकी क्षमता में वृद्धि हो. तीसरा, अधिवक्ताओं में संवेदनशीलता बढ़ानी होगी, जिससे कि वे बार-

बार सुनवाई के स्थगन की मांग न करें. चौथा, सबसे अधिक मामले सरकार

द्वारा ही लाये जाते हैं, उसे हर मामले को अदालत तक नहीं लाना चाहिए.

पांचवां, सुशासन का अभाव भी लोगों को अदालतों तक पहुंचने के लिए मजबूर करता है.

सरकार को सेवाओं और जनहित से जुड़े मसलों के विवाद त्वरित निबटारे की वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए, साथ ही स्थानीय स्तर पर मध्यस्थता, सुलह और बीच-बचाव को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. देश में न्यायिक तंत्र के चरमराने से पहले प्रधान न्यायाधीश के इन सुझावों पर गौर करने की जरूरत है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि विधि एवं न्याय मंत्री चिंता व्यक्त करने की बजाय, न्यायिक प्रक्रिया में जरूरी सुधार की दिशा में जल्द कुछ कारगर कदम उठायेंगे. न्यायिक प्रणाली की खामियों का सबसे बुरा असर समाज के निचले पायदान पर खड़े लोगों पर पड़ता है. उन्हें सुगम और त्वरित न्याय उपलब्ध कराये बिना देश में न्याय के शासन की अवधारणा अधूरी ही रहेगी.

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