डॉ सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
झंडा एक प्रतीक है और प्रतीकों पर झगड़ना हमारा पसंदीदा शौक है. लोगों को प्रतीकों पर झगड़ते देख मुझे तो कभी-कभी यह लगने लगता है कि कहीं प्रतीकों की इजाद झगड़ने-झगड़वाने के लिए ही तो नहीं की जाती? क्योंकि प्रतीक हमें एक-दूसरे से झगड़ने या लोगों में झगड़ा करवाने का जितना बढ़िया अवसर सुलभ कराते हैं, कोई और चीज नहीं कराती.
यों झगड़ने को तो हम दूसरी चीजों पर भी झगड़ते ही रहते हैं. मामूली से मामूली चीज पर भी हम इतनी शिद्दत से झगड़ लेते हैं कि देखनेवाले भी अचंभा मान जायें कि यह भी कोई झगड़ने की चीज थी? जिस चीज पर किसी का ध्यान भी न जाये, उस नगण्य चीज पर भी हम झगड़े को इतनी कलात्मक ऊंचाई तक ले जाते हैं कि दुनिया के बड़े से बड़े झगड़ची भी दांतों तले उंगली दबाने को बाध्य हो जाते हैं और इस प्रक्रिया में यह भी नहीं देखते कि उंगली अपनी ही है या दूसरे की.
जैसे कि सड़क पर फौरन पास न देने पर आगे वाली गाड़ी के ड्राइवर को गोली मार देना. अब बताओ, यह क्या कोई इतनी बड़ी बात है कि इसके लिए एक समूची गोली खराब की जाये?
यह तो फिजूलखर्ची की हद है! या जैसे पचास-सौ रुपये लेने-देने, मतलब लेकर न देने या देकर लेने की कोशिश भी करने के पीछे किसी की जान ले लेना. उधार को प्रेम की कैंची ऐसे ही नहीं कहा गया है. अलबत्ता इसकी व्याख्या लोग अकसर गलत करते हैं. इसका यह मतलब नहीं है कि उधार मत मांगना, क्योंकि उससे आपसी प्रेम पर कैंची चल जायेगी. इसका असली मतलब यह है कि उधार देकर वापस मत मांगना, वरना अगला प्रेम के अतिरेक में भर कर कैंची घुसेड़ देगा.
राष्ट्रभाषा के प्रतीक पर तो पूरा देश एक दिखाई देता है झगड़ने की दृष्टि से. जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक हिंदी खूब बोली-समझी जाती है और उसे लेकर खूब झगड़ा भी जाता है.
कहते हैं कि लोगों को झगड़ने का सुअवसर उपलब्ध कराने के लिए ही हमारे विद्वान नीति-निर्माताओं ने राज्यों के बंटवारे का आधार बहुत सोचने-विचारने के बाद भाषा को बनाया था. इससे एक भाषा बोलनेवाले लगभग सारे लोग इकट्ठे हो गये और दूसरे राज्य में गये दूसरी भाषा बोलनेवालों पर चढ़ बैठे. भाषा को राज्यों के बंटवारे का आधार न बनाते, तो सभी भाषा-भाषियों के बीच सामंजस्य और समझदारी जैसे घटिया तत्त्व विकसित हो जाने का भय था.
बात-बात पर झगड़ने की, यहां तक कि बिना किसी बात के भी झगड़ पड़ने की हमारी प्रवृत्ति को देख कर ही शायद देश में कुछ लोगों को ताऊ झगड़ू की गौरवशाली संज्ञा से नवाजा जाता रहा है. झगड़ू से ही मिलता-जुलता शब्द झंडू है, जो शायद झंड से बना है. झंड झगड़े में हारने पर होनेवाली किरकिरी को कहते हैं. मुंबई में यह शब्द हमें अकसर इस रूप में सुनाई देता था कि हो गयी झंड? वही झंड, बोले तो झगड़ा और किरकिरी, आजकल झंडे को लेकर हो रही है.
इधर हाल के दिनों में कुछ झंडुओं का कहना है कि भगवा ध्वज भी तिरंगे की तरह राष्ट्रध्वज ही है, बल्कि वह तिरंगे से भी ज्यादा राष्ट्रध्वज है, क्योंकि वह तिरंगे से पहले का है, तिरंगा उसके बाद आया. मैं उनकी इस बात को मान तो लूं, लेकिन इसमें भी खतरा यह है कि अगर कोई भगवा ध्वज से भी पहले का झंडा लेकर आ गया और उसे राष्ट्रध्वज माने जाने पर जोर देने लगा, तब तो बहुत झंड हो जायेगी और हम ख्वामख्वाह ही झंडू बन जायेंगे.
