एक ऐसे देश में, जो मानवीय विकास के सूचकांक में हमेशा निचले पायदान पर खड़ा नजर आता है, 70 फीसदी ग्रामीण परिवारों का बीमारी की स्थिति में निजी अस्पतालों और चिकित्सकों के पास पहुंचना खुद साबित करता है कि स्वास्थ्य सेवाओं का सरकारी ढांचा कितना कमजोर है. यह स्थिति तब है, जबकि निजी स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करनेवाले ग्रामीण परिवारों को औसतन करीब चार गुना ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है.
राष्ट्रीय नमूना सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के सर्वे के हालिया आंकड़े बताते हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करनेवाले ग्रामीण परिवारों का इलाज पर औसत सालाना खर्च 5,636 रुपये है, जबकि निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ लेनेवालों को औसतन 21,726 रुपये का भुगतान करना पड़ रहा है. बीमारी की स्थिति में भारी-भरकम आकस्मिक खर्च के बावजूद, देश के ग्रामीण इलाकों में 86 फीसदी, जबकि शहरी इलाकों में 82 फीसदी लोग किसी भी तरह की स्वास्थ्य बीमा योजना से नहीं जुड़े हैं. ऐसे में परिवार के किसी सदस्य की गंभीर बीमारी एक आफत बन जाती है.
चिंता की बात यह भी है कि गांवों की करीब 96 फीसदी, जबकि शहरों की भी 97 फीसदी आबादी बीमार होने पर डॉक्टर की फीस से बचने के लिए खुद ही या केमिस्ट से पूछ कर दवा ले लेती है. इलाज की यह परिपाटी अकसर बीमारी को दुरुस्त करने के बजाय उसे जटिल बना देती है. इन आंकड़ों के बरक्स यदि स्वास्थ्य के मोर्चे पर सरकार के खर्च पर नजर डालें, तो एक निराशाजनक तस्वीर सामने आती है. भारत दुनिया के उन चंद देशों में से एक है, जहां की सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य पर जीडीपी का पांच प्रतिशत से भी कम खर्च करती है.
ब्रिक्स समूह के दो देश ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका सरीखी तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्थाएं अपने जीडीपी का करीब 9 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य मद में खर्च करती हैं. भारत जैसे बड़े देश के लिए जनस्वास्थ्य की चुनौती और बड़ी है. आबादी के लिहाज से हम दुनिया में दूसरे पायदान पर हैं. जब तक कामकाजी आयुवर्ग के लोग स्वस्थ और सक्रिय नहीं होंगे, बड़ी आबादी जीडीपी में योगदान करने की बजाय उस पर बोझ साबित होती रहेगी और तेजी से विकास का ख्वाब अधूरा ही रहेगा.
अच्छी बात है कि हाल के वर्षों में कई राज्यों में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी सरकारी योजनाओं के अच्छे नतीजे दिखे हैं, लेकिन एनएसएसओ के आंकड़े बताते हैं कि इन योजनाओं के प्रसार और स्वास्थ्य को लेकर ग्रामीणों में जागरूकता के मोर्चे पर अभी काफी कुछ करने की जरूरत है.
