एक धर्मगुरु कह रहे हैं कि महिलाओं ने शनि मंदिर में पूजा की तो उन पर ईश्वर का कोप होगा, जिससे बलात्कार के मामलों में वृद्धि होगी. वे यह भी जानते हैं कि कहीं सूखा पड़ा है तो क्यों! सो उन्होंने कह डाला कि साईं बाबा की पूजा के प्रचलन के कारण लोग मराठवाड़ा के इलाके में पानी के लिए तरस रहे हैं. अपने अनूठे बोल से चर्चा में रहनेवाले ये धर्मगुरु अकेले नहीं हैं, अपने-अपने धर्ममत और पंथ की ध्वजा उठाये उनकी तरह के और भी हैं.
कोई आये दिन फैसला सुनाता है कि कौन क्या कहने पर भारतभूमि में रहने का अधिकारी है, तो कोई अपने फतवे में फैसला करता दिखता है कि देश बड़ा है या धर्म. संस्थागत धर्म की यही दिक्कत है. संस्थागत धर्म अपने विस्तार और ताकत में असीम होना चाहता है और उसकी गद्दी पर बैठे पंडे-पादरी, मौलवी-महंथ सर्वव्यापी-सर्वज्ञानी ईश्वर की बात बताते-समझाते हुए स्वयं को भी सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान बताना चाहते हैं.
वे कहते हैं उनके पास संसार की हर समस्या की व्याख्या और समाधान है और इसलिए उन्हें सर्वनियंता होने का स्वघोषित हक है! लेकिन, जो स्वयं को परम स्वतंत्र माने, उसके स्वेच्छाचारिता होने का खतरा होता है. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में इसी बात की तस्दीक करते हुए ताने-उलाहने के स्वर में लिखा- ‘परम स्वतंत्र सिर पर ना कोऊ.’
मानवता का अब तक का इतिहास भी तो यही सिखाता है कि स्वेच्छाचारित किसी की भी बर्दाश्त नहीं की जा सकती. देश के बाकी नागरिकों की तरह धर्मगुरु भी देश के नियम (संविधान) से बंधे हैं. यह नियम यदि उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी देता है, तो उनसे यह उम्मीद भी रखता है कि इस आजादी का इस्तेमाल वे बाकियों की अभिव्यक्ति को कुचलने के लिए नहीं करेंगे.
तो फिर कोई धर्मगुरु इस आजादी का इस्तेमाल आधी आबादी की धार्मिक इच्छाओं को कुचलने में कैसे कर सकते हैं? देश के संविधान ने व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, बंधुता और गरिमा को किसी धर्म का आधार लेकर देश-जीवन की कसौटी नहीं बनाया है. इसलिए धर्मगुरु चाहे कोई भी हों, वे जब तक अपने को संविधान-प्रदत्त मूल्यों के अनुकूल नहीं बनाते, उनके बोल-वचन मनुष्य-विरोधी ही माने जायेंगे.
