बैंकों का विलय

गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) और फंसे हुए कर्जों का बढ़ता बोझ, अनेक बैंकों के मूल्य में कमी, प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के कारण बैंकिंग प्रणाली में ठोस सुधारों की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है. इस स्थिति के मद्देनजर केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया शुरू कर […]

गैर-निष्पादित आस्तियां (एनपीए) और फंसे हुए कर्जों का बढ़ता बोझ, अनेक बैंकों के मूल्य में कमी, प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं के कारण बैंकिंग प्रणाली में ठोस सुधारों की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है. इस स्थिति के मद्देनजर केंद्र सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पुनर्गठित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
मजबूत और मुनाफा कमा रहे बैंकों के साथ छोटे या घाटे में चल रहे बैंकों के परस्पर विलय के जरिये बड़े बैंक बनाने से संबंधित तौर-तरीकों को निर्धारित करने की जिम्मेवारी नवगठित बैंक बोर्ड ब्यूरो को दी गयी है. पिछले महीने बैंकों के ‘ज्ञान संगम’ कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि भारत को बड़ी संख्या में नहीं, बल्कि मजबूत बैंकों की जरूरत है. माना जा रहा है कि सरकार अर्थव्यवस्था की मांग के अनुरूप क्षमतावान बड़े बैंक स्थापित करना चाहती है.
सरकार को कमजोर और घाटे में चल रहे बैंकों को समय-समय पर पूंजी उपलब्ध कराने की मजबूरी होती है. पुनर्गठन के जरिये इस मुश्किल का उपाय भी संभव है. विशेषज्ञों की राय में इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी परियोजनाओं को वित्त मुहैया कराने के लिए बड़े बैंक जरूरी हैं. बड़े बैंकों के पास पूंजी जुटाने और फंसे हुए कर्ज की वापसी की क्षमता भी अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है. शहरों में अक्सर देखा जाता है कि एक ही इलाके में अनेक बैंकों की शाखाएं हैं. विलय से बैंकों के ऐसे खर्च कम किये जा सकते हैं.
लेकिन, विलय की राह में कई चुनौतियां भी हैं. पिछले साल के ‘ज्ञान संगम’ कार्यक्रम में ज्यादातर बैंकों ने एक सुर में कहा था कि विलय के लिए यह समय ठीक नहीं है, क्योंकि फिलहाल बैंक कई समस्याओं से जूझ रहे हैं. बैंक कर्मचारियों के संगठनों ने भी विलय को निजीकरण की दिशा में एक पहल मानते हुए इसका विरोध किया है. सरकार को छंटनी की आशंकाओं से उपजे सवालों का भी सामना करना पड़ रहा है. साथ ही कुछ जानकार वैश्विक स्तर पर हुए विलयों के असफल होने का हवाला देते हुए भी सरकार को आगाह कर रहे हैं. उनकी नजर में विलय से बड़ी परिसंपत्तियों के बनने का तर्क कमजोर है.
विलय के विरोधी मानते हैं कि बैंकिंग प्रणाली की बेहतरी के लिए सही व्यापारिक रणनीति, सक्षम प्रबंधन और कुशल कार्यप्रणाली पर जोर देना जरूरी है. उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार विलय से जुड़े सभी कारकों और संभावित परिणामों के संतुलित विश्लेषण के बाद ही कोई कदम उठायेगी, ताकि अर्थव्यवस्था की मजबूती सुनिश्चित की जा सके.

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