शनिवार तड़के बेंगलुरू-नांदेड़ एक्सप्रेस 26 यात्रियों के लिए जिंदा चिता बन गयी. ट्रेन में अपने गंतव्य तक पहुंचने की निश्चिंतता के साथ सोये हुए यात्रियों की जीवन-लीला के इस तरह समाप्त होने को सिर्फ ईश्वरीय विधान- ‘होनी’ या हादसा मान कर नहीं भुलाया जा सकता. इस हादसे की एक बड़ी वजह यात्रियों की सुरक्षा को लेकर रेलवे की निराशाजनक निष्क्रियता और लापरवाही है.
डेढ़ साल के भीतर ट्रेन में आग लगने की यह दूसरी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. पिछले साल 30 जुलाई को नयी दिल्ली-चेन्नई एक्सप्रेस में लगी आग ने 35 बेकसूर लोगों को मौत की नींद सुला दिया था. 2012 में ट्रेन में आग लगने के सात मामले सामने आये थे, जबकि 2013 में अब तक ऐसा पांच बार हो चुका है. लेकिन, ऐसी घटनाओं की सतत पुनरावृत्ति के बावजूद इस इसे रोकने की दिशा में जरूरी कदम उठाने में रेल प्रशासन नाकाम रहा है. इनसानी जानों के प्रति लापरवाही का आलम यह है कि लंबी दूरी की ज्यादातर ट्रेनें आग और धुएं का पता बतानेवाले ऑटोमेटिक फायर अलार्म सिस्टम के बगैर ही पटरियों पर दौड़ रही हैं.
एक ट्रेन में यह सिस्टम लगाने की औसत लागत 35 लाख आती है, जिसे इनसानी जीवन की कीमत के सामने ‘नगण्य’ ही कहा जा सकता है. आग से बचाव की दूसरी तरकीब आगरोधी डिब्बों का इस्तेमाल करना है. लेकिन, अब तक ऐसे डिब्बे सिर्फ राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं. रेलवे भारत में लंबी दूरी की यात्राओं का सबसे मनपसंद माध्यम है. हर दिन एक करोड़ से ज्यादा भारतीय रेलवे का इस्तेमाल अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए करते हैं. रेलवे के सामने सबसे बड़ी जिम्मेवारी यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की है. लेकिन भारतीय रेल के कर्ता-धर्ता इस जिम्मेवारी से आखें चुराते रहे हैं.
पिछले डेढ़ दशकों में रेलवे से राजनीतिक लाभांश कमाने की प्रवृत्ति ने भी इसकी सेहत पर नकारात्मक असर डाला है. हादसों में गयी जानों को वापस नहीं लाया जा सकता, मगर उनसे सबक जरूर सीखा जा सकता है. लेकिन, रेल प्रशासन गलतियों को सुधारने के प्रति गंभीर नजर नहीं आता. वह मृतकों के परिजनों और घायलों के नाम मुआवजे की घोषणा कर अपनी जिम्मेवारियों की इतिश्री मान लेता है.
