हमारी हिंदी उनकी हिंदी

प्रभात रंजन कथाकार हाल में एक हिंदी सेवी से बात हो रही थी. वे एक बड़े सार्वजनिक संस्थान में हिंदी अधिकारी हैं. कहने लगे कि आनेवाले कुछ वर्षों में हिंदी में लिखना-पढ़ना खत्म हो जायेगा. बस यह बोलने की भाषा के रूप में रह जायेगी. मैंने उनको समझाने की कोशिश की कि हाल के वर्षों […]

प्रभात रंजन

कथाकार

हाल में एक हिंदी सेवी से बात हो रही थी. वे एक बड़े सार्वजनिक संस्थान में हिंदी अधिकारी हैं. कहने लगे कि आनेवाले कुछ वर्षों में हिंदी में लिखना-पढ़ना खत्म हो जायेगा. बस यह बोलने की भाषा के रूप में रह जायेगी. मैंने उनको समझाने की कोशिश की कि हाल के वर्षों में हिंदी के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है. अचानक से हिंदी किताबों की बिक्री बहुत बढ़ गयी है, हिंदी लेखकों को बड़े-बड़े पुरस्कार दिये जाने लगे हैं, हिंदी की किताबों पर अंगरेजी अखबारों में लेख छपने लगे हैं.

कहां सिमट रही है हिंदी? लेकिन उनकी बात ने मुझे एक गहरी सोच में डाल दिया. आखिर यह भी तो हिंदी की सच्चाई है.असल में मैं अपनी हिंदी की बात कर रहा था, वे अपनी हिंदी की. हम लोग हिंदी में लिखते-पढ़ते हैं, ज्यादातर ऐसे समाज में रहते हैं, जिसमें अपने जैसे लोगों से ही वास्ता पड़ता है. अपने जैसे आंकड़े पढ़ने को मिलते हैं, यह सब देख-सुन-पढ़ कर यह लगता है कि हिंदी ग्लोबल भाषा होती जा रही है.

सोशल मीडिया ने, गूगल ट्रांसलिटरेशन ने हिंदी को काफी दूर तक पहुंचा दिया है. ऐसे लोग भी हिंदी में लिखने-पढ़ने लगे हैं, जो कल तक जो सिर्फ अंगरेजी पढ़ते-लिखते थे. हिंदी के बढ़ने का और क्या प्रमाण चाहिए? फिर उनका एक सवाल दिमाग में गूंजने लगा कि भोजपुरी का प्रयोग बढ़ने लगा है, भोजपुरी के गाने, भोजपुरी के कलाकार भोजपुरी क्षेत्रों से बाहर भी जाने-पहचाने लगे हैं. तो क्या इसके आधार पर यह मान लें कि भोजपुरी एक प्रमुख भाषा हो गयी है?

असल में, उनकी बात में दम रहा हो या न रहा हो, लेकिन उनकी बात से अपनी हिंदी से ध्यान हट कर उनकी हिंदी की तरफ चला गया. आज भी हिंदी पट्टी में शिक्षा के लिए माता-पिता अंगरेजी माध्यमों के स्कूलों को पहली प्राथमिकता देते हैं, आज भी मध्यवर्गीय घरों में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं को तरजीह दी जाती है. आज भी ऐसे लोग जिनकी पहली भाषा हिंदी होती है, जिनको अंगरेजी भाषा का ज्ञान अल्प होता है, वे मध्यवर्गीय समाज में हीन भावना के साथ जीते हैं. थोड़ा हलके अंदाज में कहूं, तो मनोहर श्याम जोशी ने अपने उपन्यास ‘कसप’ में यह सवाल उठाया था कि प्रेमी-प्रेमिका प्रेम पत्रों में हिंदी कवियों की कविताओं का आदान-प्रदान क्यों नहीं करते? यहां यह कहा जा सकता है कि प्रेम के संवाद की भाषा अंगरेजी बनी हुई है.

हमारी हिंदी और उनकी हिंदी के बीच दूरी बनी हुई है. कहने का मतलब यह है कि हिंदी तो बढ़ रही है, फल-फूल भी रही है, लेकिन हिंदी समाज में उसकी व्याप्ति सम्मान की भाषा के रूप में नहीं हो रही है, गर्व की भाषा के रूप में नहीं हो रही है. आज भी अंगरेजी भाषा में लिखनेवाला एक अदना सा लेखक भी हिंदी के बड़े-बड़े लेखकों से अधिक सम्मान पाता है. जिन हिंदी भाषी घरों में पढ़ने-लिखने का चलन नहीं भी होता है, वहां भी अंगरेजी की चालू टाइप किताबें मिल जाती हैं. भले ही, ड्राइंग रूम में सजावट के सामान की तरह ही उनकी मौजूदगी रहती है. आज भी हिंदी पट्टी के मध्यवर्गीय घरों में हिंदी किताबें ड्राइंग रूम का हिस्सा सही ढंग से बन नहीं पायी हैं.

तमाम सूचना क्रांति, तकनीकी क्रांति के बावजूद यह मानसिकता बनी हुई है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि अंगरेजी के प्रति लगाव भी पहले से अधिक बढ़ा है. इस समाज के ऊपर हिंदी के फलते-फूलते जाने का फिलहाल कोई विशेष असर होता दिखाई नहीं दे रहा है.

असली संकट यह है कि हमारी हिंदी और उनकी हिंदी के बीच की इस खाई को कैसे कम किया जाये. जब तक यह बनी रहेगी, हम उनकी हिंदी से दूर बने रहेंगे और वे हमारी हिंदी से!

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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