कालेधन पर कार्रवाई

करीब डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा- ‘अंगरेज-राज सुख साज सजै सब भारी, पै धन बिदेस चलि जात यहै अति ख्वारी’. क्या ‘पनामा लीक्स’ में 500 भारतीयों के नाम उछलने के बाद किसी को भारतेंदु की यह पंक्ति याद आयी, तो इसे जायज करार दिया जायेगा? इतिहास-धारा के भीतर एक-सी लगनेवाली दो घटनाओं […]

करीब डेढ़ सौ साल पहले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा- ‘अंगरेज-राज सुख साज सजै सब भारी, पै धन बिदेस चलि जात यहै अति ख्वारी’. क्या ‘पनामा लीक्स’ में 500 भारतीयों के नाम उछलने के बाद किसी को भारतेंदु की यह पंक्ति याद आयी, तो इसे जायज करार दिया जायेगा?
इतिहास-धारा के भीतर एक-सी लगनेवाली दो घटनाओं में समानता का आभास हो सकता है, सच्चाई नहीं. यह बात तो बड़ी प्रकट है कि आज अपने देश में अंगरेजी-राज बस किस्सों-कहानियों में शेष है. अब ऐसी कोई अंगरेजी हुकूमत नहीं जो हठात् राजस्व वसूले और बलात् भारत देश का धन सात समुंदर पार भेज दे. आज भारतभूमि पर भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों का राज है. अमीर हों या गरीब, सब अपने ही लोग हैं.
तो फिर, अपनों के इस राज में देश के धन का विदेश के टैक्स-हैवन में जाना कैसे जारी है? यह प्रश्न चाहे जितना मासूम जान पड़ता हो, लेकिन कालेधन के हर खुलासे के बाद आम भारतीयों के मन में किसी-न-किसी रूप में गूंजता जरूर है. और, इस प्रश्न के गूंजने के वाजिब कारण मौजूद हैं. भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास की हल्की-सी भी जानकारी रखनेवाला जानता है कि भारतीय राष्ट्रीयता के गठन का शुरुआती चरण आर्थिक ही था, सांस्कृतिक स्वर तो कहीं बाद में जाकर मुखर हुए. भारत का स्वाधीनता संग्राम जितना सांस्कृतिक आजादी के लिए लड़ा गया, उतना ही आर्थिक आजादी के लिए भी.
बात ‘पनामा लीक्स’ की हो या इससे पहले हुए ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड खुलासे अथवा स्विस बैंकों में चोरी-छुपे खाता रखनेवाले भारतीयों के नाम सार्वजनिक होने की हो, सब-के-सब भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद में ही सेंधमारी करते जान पड़ते हैं. अब ‘पनामा लीक्स’ के पेपर्स सामने आये हैं, तो लोगों को पता चला है कि भारत के आर्थिक राष्ट्रवाद में यह सेंधमारी सिर्फ कुछ ही सालों की घटना नहीं है.
एक करोड़ दस लाख से ज्यादा की तादाद में सार्वजनिक हुए पनामा लीक्स के दस्तावेज साल 1977 से लेकर साल 2015 तक यानी उदारीकरण के दौर के पहले और बाद के दशकों में जारी आर्थिक सेंधमारी की कहानी बयान करते हैं.
इस तरह की सेंधमारी से परदा हटने पर देश की जनता बौखलाती है, उसका रोष चुनावी जनादेश के रूप में सामने आता है. केंद्र की सरकार के प्रमुख घटक दल भारतीय जनता पार्टी ने जनता के इसी रोष को भांप कर 2014 के लोकसभा चुनाव में कालेधन का मुद्दा मुखर किया और लोगों ने मोदी सरकार को जिन वायदों की वजह से चुना, उनमें विदेश में जमा कालाधन वापस लाने का मुद्दा भी शामिल था. इसलिए, यहां केंद्र की नयी सरकार की जिम्मेवारी दोहरी हो जाती है. उसे साबित करना है कि कालेधन के सवाल पर उसका रुख पूर्ववर्ती केंद्र सरकार से अलग है.
साथ ही, सरकार को चाहिए कि वह पनामा लीक्स के जरिये शक के घेरे में आये लोगों की सच्चाई जनता के सामने लाने के लिए जांच-परख का एक पुख्ता ढांचा खड़ा करे. हालांकि, ‘पनामा लीक्स’ के मसले पर मोदी सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया और तैयारी से फिलहाल संकेत मिलते हैं कि इन दोनों ही मोरचे पर यह सरकार पूर्ववर्ती केंद्र सरकार से कहीं ज्यादा गंभीर और सक्रिय है.
अगर सरकार गंभीर न होती, तो यह कह कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल सकती थी कि कालेधन की जांच के लिए पहले से ही एसआइटी गठित है और पनामा लीक्स का मामला भी उसी के न्यायाधिकार में आयेगा, इसलिए अलग से कुछ विशेष करने की जरूरत नहीं है. लेकिन, नयी सरकार बहाने की ओट न लेते हुए, बिना वक्त गंवाये कार्रवाई के मूड में आ गयी. ‘पनामा लीक्स’ के जरिये नये नामों के खुलासे के बाद पूरी स्थिति की समीक्षा के लिए एक विशेष समूह का गठन किया गया है.
पीएमओ और वित्त मंत्रालय की निगरानी में होनेवाली इस समीक्षा में सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज, भारतीय रिजर्व बैंक, फायनेंशियल इंटेलिजेंस यूनियन और फॉरेन टैक्स एंड रिसर्च विभाग के अधिकारी शामिल किये गये हैं. खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले की तह तक जाने का निर्देश दिया है.
यह स्थिति पूर्ववर्ती सरकार से तनिक भिन्न है. पनामा लीक्स के मुद्दे पर केंद्र सरकार की त्वरित कारवाई सराहनीय है.2013 में ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड खुलासे के बाद भी 500 भारतीयों के नाम कालेधन के मामले में सामने आये थे. तब वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने कहा था कि विदेशी टैक्स हैवन में पैसा रखनेवाले भारतीय लोगों की जांच की जा रही है.
जांच के नाम पर पुरानी सरकार ने वित्त मंत्रालय से जुड़े फॉरेन टैक्स एंड टैक्स रिसर्च डिवीजन के अधिकारियों के जरिये ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, केमेन आइलैंड और सिंगापुर से कराधान संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए लागू संधि के तहत शक के घेरे में आये लोगों के बैंकिंग संबंधी ब्योरे मांगे थे.
लेकिन, तुलनात्मक रूप से देखें तो नयी सरकार द्वारा मामले की जांच-परख के लिए गठित समूह एक तो अपने दायरे में ज्यादा बड़ा है, दूसरे सरकार ने इस मामले में त्वरित संज्ञान लेकर गंभीरता का परिचय दिया है. उम्मीद करनी चाहिए कि अपने खुलासों से दुनियाभर में भूचाल ला देनेवाले पनामा पेपर्स की सरकारी समीक्षा भारत में कालेधन पर अंकुश की राह भी सुझायेगा.

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