कई आशंकाएं थीं, बिहार में शराबबंदी को लेकर. इसकी बड़ी वजह सामाजिक जीवन में उसकी स्वीकार्यता पर दुविधा की स्थिति थी. ऐसे मामलों में हमें पता नहीं होता कि सरकार ने जो कानून बनाया है, समाज उसे किस हद तक स्वीकार करेगा. लेकिन, अब शराबबंदी को लेकर सामाजिक जीवन में जो हलचल दिख रही है, वह नि:संदेह बड़े बदलाव की ओर इशारा है.
यह समाज के सामूहिक मानस को अभिव्यक्त करनेवाली हलचल है. इसीलिए यह हलचल आम न रह कर खास बन जाती है. सरकार ने पहली अप्रैल से देसी शराब पर पूरी तरह पाबंदी तो लगा दी, पर शहरी इलाकों में विदेशी शराब के खिलाफ लोग जगह-जगह सड़कों पर उतर रहे हैं. पटना, भागलपुर, मुंगेर से ऐसी खबरें आयीं कि वहां लोगों ने विदेशी शराब की दुकान खोले जाने का विरोध किया. स्थानीय लोगों के मुखर विरोध का सामना पुलिस-प्रशासन को करना पड़ा. इस विरोध को सामाजिक सशक्तीकरण के तौर पर भी देखने की जरूरत है.
पहले जहां लोग चुप रह कर तमाशा देखा करते थे, अब वे इसका विरोध कर रहे हैं. सामाजिक जीवन में शराब के दुष्प्रभावों ने लोगों को सड़क पर उतरने के लिए बाध्य कर दिया. वैसे भी, शराबबंदी की पूरी प्रक्रिया पर गौर करें, तो एक बात बार-बार सामने आती है कि इसके विरोध की सुगबुगाहट सामाजिक स्तर से ही हुई थी.
यह सकारात्मक रहा कि सरकार ने विरोध का मर्म समझा और शराबबंदी की ऐतिहासिक पहल को एक मुकाम तक पहुंचाया. यह अपने आप में बेहद सकारात्मक रहा कि जनता की ओर से उठनेवाली आवाज को सरकार ने अनसुना नहीं किया. शराब का असर इतना गहरा था कि पाबंदी लगने के बाद अनेक जगहों पर लोगों ने खुशियां मनायीं.
हालांकि शराबबंदी की असली चुनौती अभी बाकी है. कानूनी सख्ती के अलावा सामाजिक स्तर पर सक्रिय हस्तक्षेप से ही शराबबंदी का असली मकसद हासिल होगा. केवल सरकारी तंत्र के भरोसे इस पर रोक संभव नहीं है. दूसरे चरण में विदेशी शराब पर पाबंदी संबंधी घोषणा राज्य सरकार ने पहले ही कर रखी है. हर किस्म के शराब का विरोध बताता है कि लोग किसी भी कीमत पर पूर्ण शराबबंदी की मानसिकता तैयार कर रहे हैं.
सामाजिक स्तर पर शराब के प्रति नफरत का यह भाव-प्रतिकार दूसरे राज्यों के लिए सबक की तरह है. इस क्रम में कुछ लोग ताड़ी के उपयोग के संदर्भ में परंपरा का हवाला दे रहे हैं. लेकिन क्या जीवन में नकारात्मक असर डालनेवाली चीजों का इस्तेमाल परंपरा के नाम पर होने देना चाहिए?
