आकांक्षाओं की सरकार

देर से ही सही, बीजेपी के साथ गंठबंधन सरकार बना कर महबूबा मुफ्ती ने राज्य में डेढ़ साल पहले हुए चुनाव के परिणाम से झांकनेवाली जन-आकांक्षाओं के अनुकूल आचरण करने की वही जरूरी समझदारी दिखायी है, जिसकी लकीर उनके पिता स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद ने खींची थी. जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 70 सीटों के लिए दिसंबर […]

देर से ही सही, बीजेपी के साथ गंठबंधन सरकार बना कर महबूबा मुफ्ती ने राज्य में डेढ़ साल पहले हुए चुनाव के परिणाम से झांकनेवाली जन-आकांक्षाओं के अनुकूल आचरण करने की वही जरूरी समझदारी दिखायी है, जिसकी लकीर उनके पिता स्वर्गीय मुफ्ती मोहम्मद सईद ने खींची थी.
जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 70 सीटों के लिए दिसंबर 2014 में हुए चुनाव में पीडीपी 28 सीटों के साथ शीर्ष पर जरूर थी, लेकिन बीजेपी ने भी 25 सीटें जीतने के साथ राज्य की राजनीति में एक नयी लकीर खींची थी. नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस की परंपरागत राजनीतिक जमीन राज्य में एकबारगी दरकती जान पड़ी. सीटों का क्षेत्रवार पैटर्न यह जताने के लिए काफी था कि राज्य की जनता ने अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अभिव्यक्त किया है. जम्मू की जनता ने बीजेपी पर भरोसा जताया, तो कश्मीर की जनता ने पीडीपी पर.
लिहाजा राज्य में पीडीपी-बीजेपी गंठबंधन सरकार होने से ही जनादेश के सम्मान की स्थिति बनती थी. लेकिन, मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद सरकार बनाने में हो रही देरी से आशंकाएं तूल पकड़ रही थीं. हर गुजरते दिन के साथ लग रहा था कि चुनाव-परिणामों में व्यक्त जन आकांक्षा कहीं मुफ्ती सईद के नहीं रहने के बाद पीडीपी की महत्वाकांक्षाओं के भार से दम न तोड़ दे.
नवगठित सरकार में पीडीपी की महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री और बीजेपी के निर्मल सिंह के उपमुख्यमंत्री बनने के साथ इन आशंकाओं पर विराम लग गया है.
आतंक प्रभावित जम्मू-कश्मीर में सरकार बनने में गतिरोध का दूर होना महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश के अभिन्न हिस्से के रूप में इस राज्य में जनतांत्रिक सरकार होने से अलगाववादी सुर अलापनेवाले गुट अलग-थलग पड़ते हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को कश्मीर की स्वायत्तता के सवाल मुखर करने में मुंह की खानी पड़ती है.
गंठबंधन की हर सरकार की तरह, अब महबूबा की सरकार के सामने भी कुछ चुनौतियां आयेंगी. लेकिन, अगर महबूबा मुफ्ती ने अपनी राजनीतिक परिपक्वता से पीडीपी के भीतर के मतभेद को हद से ज्यादा न पनपने दिया, तो इसमें कोई शक नहीं कि राज्य में प्रधानमंत्री की विशेष पहल से कायम बीजेपी के साथ उनका राजनीतिक गठबंधन एक लंबी उम्र पायेगा.

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