चिंताजनक राजनीति

सोमवार को उत्तराखंड विधानसभा में प्रस्तावित शक्ति-परीक्षण से एक दिन पहले केंद्र सरकार द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने के फैसले से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. केंद्र सरकार का कहना है कि हरीश रावत की सरकार अपना बहुमत खो चुकी थी, इसलिए राष्ट्रपति शासन लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. लेकिन, […]

सोमवार को उत्तराखंड विधानसभा में प्रस्तावित शक्ति-परीक्षण से एक दिन पहले केंद्र सरकार द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने के फैसले से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. केंद्र सरकार का कहना है कि हरीश रावत की सरकार अपना बहुमत खो चुकी थी, इसलिए राष्ट्रपति शासन लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. लेकिन, बहुमत होने या न होने का पता तो तभी चल सकता है, जब विधानसभा में पक्ष-विपक्ष के विधायकों की गिनती हो! ऐसा होने से पहले ही सरकार को हटाने का निर्णय सही नहीं ठहराया जा सकता है.
1994 में बहुचर्चित बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में स्पष्ट निर्देश है कि संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत कार्रवाई करने की अनिवार्य शर्त विधानसभा में शक्ति-परीक्षण है. ऐसे में कांग्रेस और अन्य कई लोगों के इस आरोप को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है कि भाजपा विपक्षी सरकारों को अस्थिर कर पिछले दरवाजे से सत्ता पर काबिज होने का जुगत लगा रही है. कुछ समय पहले अरुणाचल प्रदेश में जो घटनाक्रम चला था, उत्तराखंड में उसकी पुनरावृत्ति होती दिखायी दे रही है.
अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग का मुद्दा 1950 के दशक से उठाया जाता रहा है. कांग्रेस की सरकारों द्वारा विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को बरखास्त करने के अनेक उदाहरण हैं. तब भाजपा (1977 से पहले जनसंघ) कांग्रेस पर सिद्धांतहीन अनैतिक राजनीति करने का आरोप लगाती थी. लेकिन, सहकारी संघवाद का नारा देनेवाली भाजपा खुद ही कांग्रेस की राह पर चल पड़ी है.
अगर लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति भाजपा की सचमुच निष्ठा होती, तो वह विधानसभा के पटल पर हरीश रावत सरकार के विश्वास-मत के प्रस्ताव के नतीजे का इंतजार करती. यदि सरकार के पास जरूरी बहुमत नहीं होता, भाजपा राज्य में नये चुनाव की मांग कर सकती थी. लेकिन, कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे के साथ मिल कर सरकार बनाने की भाजपा की कवायद और राष्ट्रपति शासन लागू करना आदर्शवादी राजनीति करने के भाजपा के दावे की पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं. निश्चित रूप से उत्तराखंड प्रकरण हमारी राजनीति का एक निराशाजनक अध्याय है.

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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