चिंताजनक शैक्षणिक स्थिति

सर्वशिक्षा अभियान जैसी नयी योजनाओं और खर्चे की बढ़ोत्तरी के जरिये सरकार ने बीते दो दशक में साक्षरता बढ़ाने के भरपूर प्रयत्न किये हैं. इसके कुछ सकारात्मक नतीजे भी देखने को मिले हैं. मिसाल के लिए राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के नये आंकड़ों के आधार पर अब कहा जा सकता है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा […]

सर्वशिक्षा अभियान जैसी नयी योजनाओं और खर्चे की बढ़ोत्तरी के जरिये सरकार ने बीते दो दशक में साक्षरता बढ़ाने के भरपूर प्रयत्न किये हैं. इसके कुछ सकारात्मक नतीजे भी देखने को मिले हैं. मिसाल के लिए राष्ट्रीय सैंपल सर्वे के नये आंकड़ों के आधार पर अब कहा जा सकता है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा के मामले में देश सार्वीकरण की स्थिति तक आ पहुंचा है.

निरक्षरता कम करने में बहुत मदद मिली है. 15 साल और इससे ज्यादा उम्र के निरक्षर लोगों की संख्या देशस्तर पर कम होकर तकरीबन 30 प्रतिशत पर चली आयी है. बहरहाल, बात जब चिकित्सा और शिक्षा जैसी अनिवार्य सेवाओं की होती है, तो यही देखना पर्याप्त नहीं कि उसके दायरे में विस्तार हो रहा है या नहीं, बल्कि यह देखना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है कि सेवा की गुणवत्ता कैसी है. ज्यादा से ज्यादा लोग शिक्षा जैसी अनिवार्य सेवा का लाभ उठायें और यथाशीघ्र सार्वीकरण की स्थिति हासिल कर ली जाये- यह चुनौती का एक मोर्चा है.

दूसरा मोर्चा है कि सबको समान और उच्च गुणवत्ता की सेवा हासिल हो. प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा के दायरे में विस्तार तो हुआ है, लेकिन बहुत सी चुनौतियां बनी हुई हैं और इनमें सबसे गहरी चुनौती गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की है.

विश्व बैंक के एक नये शोध-अध्ययन में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के मामले में आ रही बाधाओं का जिक्र करते हुए कहा गया है कि भारत के गंवई इलाके के सरकारी स्कूलों में लगभग एक चौथाई (23.6 प्रतिशत) शिक्षक स्कूल से गैरहाजिर रहते हैं. विश्व बैंक ने अपने अध्ययन के लिए देश भर के कुल 1200 गांवों के स्कूलों को नमूने के तौर पर चुना और शिक्षकों की गैरहाजिरी से संबंधित आठ सालों (2003 से 2010) के आंकड़े एकत्र किये. रिपार्ट के मुताबिक, शिक्षकों की इस गैरहाजिरी की वजह से सरकार को सालाना डेढ़ अरब डॉलर का घाटा उठाना पड़ता है.

दूसरे शब्दों में कहें, तो सरकार ने सर्वशिक्षा अभियान को चलाये रखने के लिए लोगों पर जो कर लगाया है, उससे हासिल कुल रकम का 60 प्रतिशत हिस्सा, जो शिक्षकों को वेतन देने में खर्च होता है, उनकी गैरहाजिरी के कारण बेकार चला जाता है. यह स्पष्ट ही भ्रष्टाचार का मामला है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने लिए निर्धारित उत्पादक काम दरअसल करता नहीं होता, लेकिन इस एवज में होनेवाले भुगतान को हासिल करता जाता है.

शिक्षा-क्षेत्र पर जो गैर-पूंजीगत खर्च होता है, उसमें शिक्षकों के वेतन का हिस्सा 80 प्रतिशत है यानी शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत होनेवाला खर्चों में सबसे ज्यादा बड़ा हिस्सा शिक्षकों को दिये जानेवाले खर्च का ही है. शिक्षा के अधिकार के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए 30 छात्रों पर एक शिक्षक रखने की बात सोची गयी है और ठीक इसी कारण शिक्षकों की संख्या बढ़ाने को जरूरी मान कर सालाना 5 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्चा उठाना सरकार के लिए जरूरी हो गया है.

लेकिन, कम-से-कम विश्व बैंक की नयी रिपोर्ट के तथ्यों को देख कर ऐसा नहीं लगता कि ज्यादा संख्या में शिक्षकों को बहाल करके गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने का लक्ष्य अपेक्षित स्तर तक पूरा हो रहा है. सरकारी स्कूलों में दी जानेवाली शिक्षा की गुणवत्ता में कमी पाकर ही अब लोग अपने जरूरी खर्चों में कटौती करने की कीमत पर भी बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने पर ज्यादा जोर देने लगे हैं.

नेशनल सैंपल सर्वे की नयी रिपोर्ट में इस रुझान की तरफ इशारा करते हुए कहा गया है कि 1994-95 में प्राइवेट अथवा गैर-सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में प्राथमिक स्तर की कक्षाओं में पढ़नेवाले विद्यार्थियों का औसत मान तकरीबन 22 प्रतिशत था, जो दो दशक बाद 2013-14 में बढ़ कर लगभग 38 प्रतिशत हो गया है.

नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े यह भी बताते हैं कि प्राथमिक शिक्षा के मामले में दो दशक के भीतर बच्चों पर अभिभावक का खर्चा कम-से-कम 9 गुना बढ़ा है, जबकि उनके औसत मासिक खर्चे में इस अवधि में कहीं कम बढ़ोत्तरी (पांच गुना) हुई है. दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय परिवार सरकारी स्कूलों की शिक्षा को कम गुणवत्ता की मान कर अपने अन्य जरूरी खर्चे में कटौती करके बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं.

एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (2014) में इस रुझान की तरफ संकेत करते हुए बताया गया है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन का प्रतिशत घट रहा है. साल 2007 में सरकारी स्कूलों में 72.9 प्रतिशत बच्चे नामांकित थे, लेकिन सात साल बाद यह नामांकन घट कर 63.1 प्रतिशत पर पहुंच गया.

यही नहीं पांचवीं क्लास के जितने बच्चे 2007 में दूसरी क्लास की किताबों को ठीक-ठीक पढ़ने में सक्षम थे, उनकी संख्या भी 2014 में बहुत ज्यादा घट गयी. एकबारगी यह कहना तो मुश्किल है कि शिक्षकों की गैरहाजिरी की समस्या को दूर करने के लिए अगर निगरानी पर ज्यादा पर्यवेक्षक तैनात कर दिये जायें, तो सरकारी स्कूलों की शिक्षा में गुणवत्ता की बहाली हो जायेगी. यही समाधान विश्व बैंक की रिपोर्ट में सुझाया गया है.

बहरहाल, गैरहाजिरी पर अंकुश लगाने के साथ-साथ योग्य शिक्षकों के चयन, उनके सेवाकालीन समुचित प्रशिक्षण, सम्मानजनक वेतन और पढ़ाई से अलग काम ना लेने जैसी स्थितियों को सुनिश्चित किया जाये, तो निश्चित ही सरकारी स्कूली में शिक्षा की दशा बेहतर होगी. यह बात सरकार और समाज को ठीक से समझ लेनी चाहिए कि अच्छी शिक्षा के अभाव में एक विकसित और समृद्ध देश का निर्माण असंभव होगा.

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