नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) द्वारा पांच करोड़ रुपये के जुर्माने के साथ सशर्त मंजूरी के बाद दिल्ली में 11 से 13 मार्च तक आर्ट ऑफ िलविंग के ‘विश्व सांस्कृतिक उत्सव’ पर छाये संशय के बादल छंट गये हैं. एनजीटी के निर्देश पर दायर हलफनामे में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कहा कि यमुना किनारे अस्थायी निर्माण के लिए उसकी मंजूरी की जरूरत नहीं है.
हालांकि, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने एनजीटी को सूचित किया कि उसने इस उत्सव के लिए मंजूरी नहीं दी है. उधर, राज्यसभा में भी विपक्षी दलों ने इस आयोजन से पर्यावरण को होनेवाले नुकसान का मुद्दा उठाया. आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक श्री श्री रविशंकर आध्यामिक एवं मानवतावादी धर्मगुरु हैं. फाउंडेशन के 35 साल होने के मौके पर वे यदि ध्यान और शांति प्रार्थनाओं के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, तो इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. लेकिन, इतने बड़े आयोजन के लिए मंजूरी देने से पहले यह देखना जरूरी था कि इससे आसपास के पर्यावरण पर कैसा और कितना असर पड़ेगा.
कार्यक्रम के लिए करीब 1000 एकड़ क्षेत्र को अस्थायी गांव के रूप में तैयार किया गया है, जिसमें सैकड़ों शौचालय, पार्किंग स्थल और यमुना नदी पर कुछ पीपा पुल भी बनाये गये हैं. इसमें सात एकड़ में फैले विशाल मंच पर करीब 150 देशों के 35 हजार कलाकार सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करेंगे. उत्सव में दुनियाभर से 3.5 लाख लोगों के आने की उम्मीद है. इस आयोजन का स्थल यमुना के पिछले 10 साल के बाढ़ क्षेत्र के भीतर है, जबकि एनजीटी ने बीते 25 वर्ष के बाढ़ क्षेत्र के अंदर किसी भी आयोजन और निर्माण को प्रतिबंधित कर रखा है.
एनजीटी में अपील दायर करनेवाले पर्यावरणविद् मनोज मिश्रा का मानना है कि कार्यक्रम के लिए यमुना के डूब क्षेत्र की हरियाली को जला कर और मलबा डाल कर पूरे क्षेत्र को समतल कर दिया गया, जिससे यमुना के माहौल को हमेशा के लिए नुकसान हुआ है. जाहिर है, एक ऐसे समय में जब पर्यावरण को लेकर पूरी दुनिया में चिंता गहरा रही है, इस आयोजन के लिए मंजूरी देते वक्त संस्थाओं द्वारा पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज किया जाना कई सवाल छोड़ गया है.
