Peace in West Asia : अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध फिलहाल रुक गया है, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच 15 दिनों के लिए युद्ध विराम पर सहमति बन गयी है. हालांकि कुछ दिन पहले तक भी समझौता होना मुश्किल लग रहा था. ट्रंप ने तो यहां तक कहा दिया था कि एक सभ्यता समाप्त होने वाली है. ईरान भी युद्ध समाप्त न करने पर अड़ा हुआ था. उसका कहना था कि समझौते को लेकर बातचीत शुरू तो होती है, पर अमेरिका उसे बीच में समाप्त कर देता है और ईरान पर बमबारी शुरू हो जाती है. उस हिसाब से 15 दिनों का यह जो समय मिला है, वह शांति से सोच-विचार का समय है कि एक-दूसरे की कौन-सी बात माननी है और कौन सी नहीं. इस दौरान यदि स्थायी शांति के लिए रास्ता तैयार हो जाता है, तो यह राहत की बात होगी. हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि युद्ध विराम से स्थायी शांति हो जायेगी. यह समझौता संकेत देता है कि ईरान युद्ध समाप्ति की ओर है.
यहां इस बात पर विचार करना भी जरूरी है कि जो ट्रंप एक दिन पहले ईरान को धमकी दे रहे थे, वह अचानक युद्ध विराम पर कैसे सहमत हो गये. दरअसल, ट्रंप की बातों से लोगों को यही लगा कि अमेरिका परमाणु हमले की दिशा में आगे बढ़ रहा है. या तो अमेरिका ईरान को नष्ट करने के लिए अपना खुद का परमाणु हथियार इस्तेमाल करेगा, या ईरान ने जो अपने परमाणु एसेट, रिएक्टर छिपाकर रखे हुए हैं, उस पर गहराई तक मार करने वाले डीप पेनेट्रेशन बम से प्रहार करेगा. ट्रंप के इस बयान का आकलन शुरू हो गया था कि इसका दुनिया पर, खासकर ईरान के पड़ोसी देशों पर क्या असर होगा. भारत ने भी इस दिशा में सोचना शुरू किया कि अमेरिका के इस कदम से उसे क्या नुकसान होगा.
यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र युद्ध रुकवाने के लिए बातचीत कर रहे थे. युद्ध विराम में इन तीनों की भूमिका है. चूंकि पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से अच्छी दोस्ती है, सो मुनीर ने ट्रंप को समझाया होगा कि वह परमाणु हमले जैसा कदम न उठायें, क्योंकि ईरान का पड़ोसी होने के नाते उसे भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, क्योंकि रेडिएशन के प्रभाव से समुद्र का पानी जहरीला हो जायेगा और लोगों की जान पर बन आयेगी. अमेरिका में डेमोक्रेट्स की तरफ से भी ट्रंप पर दबाव पड़ना शुरू हो गया था और उन पर महाभियोग चलाने पर भी विचार किया जा रहा था.
दरअसल, अमेरिकी नहीं चाहते कि ट्रंप के गलत कदमों से विश्वयुद्ध जैसे हालात बनें. तो अपने लोगों के दबाव के कारण भी 15 दिन का युद्ध विराम घोषित हुआ. इस बात पर भी दुनिया की नजर होगी कि युद्ध विराम के बाद आगे क्या होता है, क्योंकि ईरान बार-बार कह रहा है कि उसका काफी नुकसान हुआ है और उसका भुगतान यदि अमेरिका नहीं करता है, तो वह होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर कर लगाकर इस नुकसान की भरपाई करेगा. इस युद्ध विराम को ईरान की जीत और अमेरिका-इस्राइल की नैतिक हार के रूप में नहीं देखना चाहिए. ऐसी सोच सही नहीं है, बल्कि अमेरिका, इस्राइल और ईरान, तीनों को यह सोचना चाहिए कि किसी भी तरह से क्षेत्र में शांति आये.
इस समय यदि दोनों पक्षों की ओर से अपनी-अपनी जीत के दावे किये जायेंगे, नफा-नुकसान की बातें की जायेंगी, तो हो सकता है कि फिर से कोई पेच फंस जाये और युद्ध विराम विफल हो जाये. इसलिए, अभी इस तरह की बातों से बचने की जरूरत है. अब चूंकि युद्ध विराम हो चुका है, और सारा झगड़ा ही यूरेनियम संवर्धन को लेकर शुरू हुआ था, तो स्वाभाविक है कि शांति वार्ता में इस बारे में भी चर्चा होगी. हां, यह देखना होगा कि इस चर्चा में कौन-कौन से देश शामिल होते हैं. इसमें पाकिस्तान मुख्य भूमिका निभायेगा या और भी देश चर्चा में अमेरिका और ईरान के साथ जुड़ेंगे, बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ेगी, और जो भी शांति वार्ताकार होंगे, उनकी अपनी सरकारों के अंदर उनकी बात कितनी मानी जायेगी.
प्रश्न है कि क्या इस युद्ध से पश्चिम एशिया में शांति आ पायेगी, क्योंकि इस्राइल और लेबनान के बीच भी संघर्ष चल रहा है. तो इसका उत्तर है हां, क्योंकि युद्ध विराम को लेकर ईरान की जो 10 सूत्री योजना है, उसमें कहा गया है कि ईरान के जो प्रॉक्सी हैं, उन पर भी हमले नहीं होने चाहिए. इसमें लेबनान भी आ जाता है. अंत में, यह युद्ध विराम अत्यंत जरूरी था. क्योंकि होर्मुज में व्यवधान उत्पन्न होने के बाद हूथी विद्रोहियों ने बाब अल मंडाब में आवाजाही बाधित करने की बात कही थी. यदि ऐसा हो जाता, तो स्थिति और भी खराब हो जाती, क्योंकि स्वेज नहर से जो सामान सऊदी अरब को जाता है, वह सब भी रुक जाता. तो युद्ध विराम ने बाब अल मंडाब को लेकर ईरान को अपने कदम को पीछे करने का एक मौका दिया है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
